एम्स बिलासपुर में हाइड्रोथर्मल ऑटोक्लेव रिएक्टर तकनीक को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू 

एम्स बिलासपुर चिकित्सा और अनुसंधान के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। संस्थान में हाइड्रोथर्मल ऑटोक्लेव रिएक्टर तकनीक को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई

Jan 10, 2026 - 15:37
 0  11
एम्स बिलासपुर में हाइड्रोथर्मल ऑटोक्लेव रिएक्टर तकनीक को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू 
Paras School The Rose Orchid World School Admission Doon Valley Deeserve Media
Paras School The Rose Orchid World School Admission Doon Valley Deeserve Media

यंगवार्ता न्यूज़ - बिलासपुर    10-01-2026

एम्स बिलासपुर चिकित्सा और अनुसंधान के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। संस्थान में हाइड्रोथर्मल ऑटोक्लेव रिएक्टर तकनीक को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह अत्याधुनिक उपकरण न केवल शोध की गुणवत्ता बढ़ाएगा, बल्कि भविष्य में कैंसर और ऑर्थोपेडिक (हड्डी रोग) के मरीजों के लिए इलाज को अधिक सटीक, सस्ता और सुरक्षित बनाने में गेम-चेंजर साबित होगा।

यह मशीन सीधे तौर पर कैंसर का इलाज नहीं करती, लेकिन इलाज को बेहतर बनाने वाली तकनीक की नींव है। इस रिएक्टर से ऐसे स्मार्ट नैनो-पार्टिकल्स बनाए जाएंगे जो दवा को शरीर के स्वस्थ हिस्सों को छुए बिना सीधे ट्यूमर तक पहुंचाएंगे। 

इससे बाल झड़ने और कमजोरी जैसे साइड-इफेक्ट्स से मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी। एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी जांच में इन नैनो-कणों के इस्तेमाल से कैंसर की पहचान शुरुआती स्टेज में ही संभव हो सकेगी। 

इस तकनीक से हाइड्रॉक्सीएपेटाइट जैसे पदार्थ तैयार किए जाते हैं, जो बिल्कुल असली हड्डियों की तरह काम करते हैं। इनसे बने घुटने, कूल्हे और डेंटल इंप्लांट्स अधिक मजबूत होते हैं और शरीर इन्हें जल्दी स्वीकार करता है, जिससे संक्रमण का खतरा कम और रिकवरी तेज होती है। स्वदेशी निर्माण से इंप्लांट्स की कीमतें घटेंगी, जिससे गरीब से गरीब मरीज को भी आधुनिक सर्जरी का लाभ मिल सकेगा। 

विशेषज्ञों के अनुसार, यह रिएक्टर 100 से 300 डिग्री सेल्सियस तापमान और भारी दबाव में काम करता है। यह लैब के अंदर ऐसी नियंत्रित रासायनिक प्रतिक्रियाएं कराता है जो सामान्य परिस्थितियों में असंभव हैं। इसका उपयोग न केवल चिकित्सा में, बल्कि वाटर ट्रीटमेंट, बैटरी विकास और प्रदूषण नियंत्रण जैसे पर्यावरण संरक्षण कार्यों में भी होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छात्रों और वैज्ञानिकों को वर्ल्ड-क्लास तकनीक पर काम करने का अवसर मिलेगा, जिसका अंतिम लाभ सीधे तौर पर मरीजों को मिलेगा। यह तकनीक एम्स बिलासपुर को केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि चिकित्सा शोध का केंद्र बनाएगी। कई बार मरीजों पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर करना बंद कर देती हैं। 

यह मशीन लैब के भीतर उच्च तापमान और दबाव में नए रासायनिक अणुओं को विकसित करने में मदद करती है, जो जटिल इन्फेक्शन को जड़ से खत्म करने वाली नई दवाएं बनाने में सहायक होंगे। जब चिकित्सा तकनीक और शोध संस्थान के अंदर होंगे, तो भविष्य में जांच और दवाओं के लिए मरीजों को बड़े शहरों या महंगे निजी लैब के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow