जानिए क्या है “टिटियाना पंचायत: सर्वसम्मति व्यवस्था के पीछे की पूरी सच्चाई?”
ग्राम पंचायत टिटियाना की “सर्वसम्मति प्रणाली” को अक्सर एक आदर्श मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसे सामाजिक एकता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक सहमति का प्रतीक बताया जाता है। लेकिन जब इस व्यवस्था को जमीनी स्तर पर परखा जाता है, तो इसकी वास्तविकता इससे काफी भिन्न दिखाई देती है।
ग्राम पंचायत टिटियाना की “सर्वसम्मति प्रणाली” को अक्सर एक आदर्श मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसे सामाजिक एकता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक सहमति का प्रतीक बताया जाता है। लेकिन जब इस व्यवस्था को जमीनी स्तर पर परखा जाता है, तो इसकी वास्तविकता इससे काफी भिन्न दिखाई देती है। यह प्रणाली दिखने में समावेशी लगती है, लेकिन व्यवहार में यह प्रतिनिधित्व की गंभीर असमानता को जन्म देती है। जिसमें केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का ही प्रतिनिधित्व है।
वर्ष 2020 में पंचायत चुनाव के दौरान इस “सर्वसम्मति प्रणाली” की शुरुआत की गई थी। यह व्यवस्था यहाँ के अन्य पिछड़ा वर्ग के बुद्धिजीवी लोगों द्वारा बनायी गई है जिसमें शिक्षक मुख्य रूप से शामिल है दावा किया गया कि यह व्यवस्था गांव के हर घर को समान प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से बनाई गई है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह व्यवस्था मुख्यतः एक ही वर्ग—अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)—तक सीमित है, जबकि पंचायत में अनुसूचित जाति (SC) के लोग भी पर्याप्त संख्या में निवास करते हैं।
इस प्रणाली के तहत “बेड़ा रोटेशन प्रणाली” लागू की गई, जिसमें गांव के चार “बेड़ों” को शामिल किया गया है। ये सभी बेड़े मुख्य रूप से भाट समुदाय (OBC) से संबंधित हैं। दूसरी ओर, अनुसूचित जाति के लोगों के अपने अलग समूह हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में “खोटे” कहा जाता है, और उन्हें इस रोटेशन प्रणाली में शामिल नहीं किया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि चयन प्रक्रिया से अनुसूचित जाति वर्ग को व्यवस्थित रूप से बाहर रखा गया है और उनका प्रतिनिधित्व केवल आरक्षित सीटों तक सीमित कर दिया गया है।
भारतीय संविधान और पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज के प्रत्येक वर्ग—विशेषकर अनुसूचित जाति और जनजाति—को समान राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। ऐसे में यदि किसी स्थानीय व्यवस्था में किसी वर्ग की भागीदारी सीमित या समाप्त हो जाती है, तो यह न केवल संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है, बल्कि सामाजिक न्याय की भावना के भी खिलाफ है।
इस प्रणाली की एक और गंभीर समस्या यह है कि पंचायत के विभिन्न पदों—जैसे प्रधान, उप-प्रधान, बीडीसी सदस्य और वार्ड मेंबर—के लिए इच्छुक उम्मीदवारों को नामांकन से पहले मंदिर समिति के समक्ष एक निश्चित राशि जमा करनी होती है। यह राशि पद के अनुसार निर्धारित है—प्रधान के लिए 4 लाख रुपये, उप-प्रधान के लिए 2 लाख रुपये, बीडीसी सदस्य के लिए 1 लाख रुपये और वार्ड मेंबर के लिए 50 हजार रुपये। चिंताजनक बात यह है कि यह राशि पंचायत के विकास के लिए नहीं, बल्कि मंदिर समिति में जमा होती है, इतिहास पर नजर डालें तो यह भी स्पष्ट होता है कि पंचायत में अनुसूचित जाति वर्ग को वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। आज तक अनुसूचित जाति से कोई भी व्यक्ति उप-प्रधान पद पर निर्वाचित नहीं हुआ है, और प्रधान पद पर भी केवल आरक्षित सीट के माध्यम से ही दो बार चुनाव के द्वारा प्रतिनिधित्व मिला है। यह स्थिति इस धारणा को दर्शाती है कि अनुसूचित जाति को केवल तब ही प्रतिनिधित्व मिल सकता है जब सीट आरक्षित हो।
सोशल मीडिया पर इस पंचायत की जो सकारात्मक छवि प्रस्तुत की जा रही है, वह जमीनी सच्चाई को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती। वास्तविकता यह है कि “सर्वसम्मति प्रणाली” के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई है, जो एक विशेष वर्ग को प्राथमिकता देती है और अन्य वर्गों को हाशिए पर रखती है।
भारतीय संविधान ने पंचायती राज व्यवस्था को इसलिए मजबूत किया था ताकि समाज के कमजोर और हाशिए पर खड़े वर्गों को भी बराबरी से आवाज मिले। लेकिन टिटियाना में जो मॉडल खड़ा किया गया है, वह संविधान की भावना के ठीक उलट है।
इसी संदर्भ में डॉ. भीमराव अंबेडकर युवा क्लब, लानी ने इस पूरी व्यवस्था का कड़ा विरोध किया है। क्लब ने इसे सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ बताया है। संगठन ने स्पष्ट किया है कि यह “सर्वसम्मति प्रणाली” नहीं, बल्कि एक पक्षीय और भेदभावपूर्ण व्यवस्था है, जिसमें अनुसूचित जाति वर्ग को जानबूझकर निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा गया है।
क्लब ने यह भी घोषणा की है कि वह इस मामले को औपचारिक रूप से उठाते हुए चुनाव आयोग को एक विस्तृत माँग पत्र सौंपेगा, जिसमें इस प्रणाली की जांच, इसकी वैधता पर सवाल और निष्पक्ष एवं समावेशी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करने की मांग की जाएगी।
सोशल मीडिया पर चमकती इस पंचायत की छवि और जमीन पर मौजूद सच्चाई के बीच गहरा अंतर है। असल में यह मॉडल लोकतंत्र की मजबूती नहीं, बल्कि उसके ढांचे को कमजोर करने का उदाहरण है—जहां सहमति के नाम पर असहमति को दबा दिया जाता है।
स्रोत: डॉ. भीमराव अंबेडकर युवा क्लब, लानी, ग्राम पंचायत टिटियाना
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