यंगवार्ता न्यूज़ - मंडी 13-09-2026
हिमालयी क्षेत्रों में बारिश के दौरान भूस्खलन की घटनाओं से निपटने के लिए अब तकनीक की मदद से पहले ही खतरे का अनुमान लगाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी के शोधकर्ताओं ने मशीन लर्निंग आधारित ऐसा सिस्टम विकसित किया है, जो क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों और बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण कर संभावित भूस्खलन वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करेगा।
इस तकनीक का उद्देश्य भूस्खलन की संभावना वाले इलाकों में समय रहते अलर्ट जारी करना और आपदा से होने वाले नुकसान को कम करना है। शोध को Machine Learning-Driven Landslide Nowcasting for Operational Early Warning in the Himalayan Region विषय पर तैयार किया गया है और इसे यूरोपीय भूविज्ञान संघ महासभा EGU-26 में प्रस्तुत किया गया। शोध में IIT मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग के शोधार्थी अंकित सिंह , नितेश धीमान और भावना पाठक ने प्रो. डेरिक्स प्रेज शुक्ला के मार्गदर्शन में काम किया है।
2017 से 2024 तक के आंकड़ों का किया विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने वर्ष 2017 से 2024 के बीच हिमालयी क्षेत्र में सामने आई भूस्खलन की घटनाओं के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसके लिए रैंडम फॉरेस्ट मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसमें क्षेत्र की ढलान, भू-आकृति, भूगर्भीय संरचना, जल स्रोतों और मानवीय गतिविधियों जैसे कई कारकों को शामिल किया गया। पहले इन आंकड़ों के आधार पर भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की गई। इसके बाद बारिश और अन्य परिस्थितियों के आधार पर भूस्खलन की तत्काल संभावना का आकलन करने वाला मॉडल तैयार किया गया।
संवेदनशीलता मानचित्र और बारिश मॉडल को जोड़ा
शोध की खास बात यह है कि भूस्खलन संवेदनशीलता से जुड़े मॉडल को बारिश के प्रभाव वाले मॉडल के साथ जोड़ा गया है। इससे ऐसा नाउ कास्टिंग सिस्टम तैयार हुआ है, जो वास्तविक समय के करीब संभावित भूस्खलन वाले स्थानों की जानकारी देने में सक्षम हो सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अत्यधिक बारिश की घटनाओं में बढ़ोतरी और हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से हो रहे निर्माण एवं अन्य मानवीय गतिविधियों के बीच इस तरह की तकनीक आपदा प्रबंधन के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। भविष्य में इस सिस्टम को हिमालयी राज्यों की ऑपरेशनल अर्ली वार्निंग व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। इससे प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियां संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से तैयारी कर सकेंगी और जरूरत पड़ने पर स्थानीय लोगों को समय रहते सतर्क किया जा सकेगा। प्रो. डेरिक्स प्रेज शुक्ला के अनुसार, इस तकनीक का आगे उपयोग हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन की पूर्व चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है।