विश्वविद्यालय में हुई गैर कानूनी तरीके से भर्तियों में पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायिक जांच की उठाई मांग
आज स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय कुलपति को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए विश्वविद्यालय में पारदर्शिता, जवाबदेही और वैधानिक प्रावधानों के पालन की मांग की। एसएफआई ने कहा कि यह ज्ञापन किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की संस्थागत साख, शैक्षणिक गरिमा और सार्वजनिक धन की सुरक्षा के उद्देश्य से दिया गया है।
यंगवार्ता न्यूज - शिमला, 28 जुलाई, 2026 :
आज स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय कुलपति को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए विश्वविद्यालय में पारदर्शिता, जवाबदेही और वैधानिक प्रावधानों के पालन की मांग की। एसएफआई ने कहा कि यह ज्ञापन किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की संस्थागत साख, शैक्षणिक गरिमा और सार्वजनिक धन की सुरक्षा के उद्देश्य से दिया गया है।
एसएफआई ने कहा कि पिछले एक माह के दौरान संगठन ने विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष अनेक गंभीर मुद्दे उठाए हैं। इन मुद्दों का आधार सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेज, विश्वविद्यालय के आधिकारिक अभिलेख, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट संख्या 4 (2025), विश्वविद्यालय अधिनियम तथा यूजीसी के नियम हैं। संगठन का कहना है कि विश्वविद्यालय लगातार आर्थिक संकट का हवाला देकर विद्यार्थियों पर फीस वृद्धि का बोझ डाल रहा है, जबकि दूसरी ओर प्रशासनिक एवं वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े गंभीर प्रश्न सामने आ रहे हैं। यदि विश्वविद्यालय वास्तव में आर्थिक संकट से गुजर रहा है, तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि सार्वजनिक धन का उपयोग किस प्रकार किया गया।
एसएफआई ने विश्वविद्यालय से संबद्ध निजी एवं सरकारी महाविद्यालयों के निरीक्षण की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने की मांग की। संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा सेवानिवृत्त शिक्षकों की निरीक्षण टीम गठित की गई है, लेकिन निरीक्षण प्रक्रिया पूर्णतः निष्पक्ष, नियमसम्मत और पारदर्शी होनी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार या समझौते की आशंका समाप्त हो सके। संगठन ने कहा कि इस विषय में भी सूचना के अधिकार के माध्यम से तथ्य जुटाए गए है
एसएफआई ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 की धारा 2(15) के कथित उल्लंघन का भी मुद्दा उठाया। संगठन का कहना है कि यदि किसी कंप्यूटर प्रोग्रामर को बिना अकादमिक परिषद की स्वीकृति के शिक्षक मानते हुए प्रोफेसर के रूप में सेवानिवृत्त किया गया, जबकि समान प्रावधान के अंतर्गत आने वाली एक महिला शिक्षिका को ऐसे अधिकारों से वंचित रखा गया, तो इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। संगठन ने कहा कि यदि यह तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह समानता और लैंगिक न्याय के सिद्धांतों के भी विपरीत होगा।
कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) के अंतर्गत हुई पदोन्नतियों पर भी एसएफआई ने गंभीर प्रश्न उठाए। संगठन ने कहा कि यूजीसी विनियम-2010 के क्लॉज-10 के अनुसार सभी सीएएस पदोन्नतियों की स्वतंत्र न्यायिक जांच होनी चाहिए। एसएफआई का कहना है कि उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2012 में नियुक्त कुछ सहायक आचार्यों को वर्ष 2018 एवं 2020 में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति दी गई, जबकि नियमानुसार पात्रता अवधि बाद में पूरी होती है। यदि पूर्व सेवाओं की गणना नियमों के विपरीत की गई है, तो सार्वजनिक धन से दिए गए एरियर की भी समीक्षा आवश्यक है। संगठन ने यह भी प्रश्न उठाया कि यदि वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. एच.एस. बन्याल को बहु-संस्थागत अनुभव का लाभ नहीं दिया गया, तो अन्य व्यक्तियों को वही लाभ किस आधार पर दिया गया।
एसएफआई ने ऐसे मामलों की भी जांच की मांग की, जिनमें एक ही एपीआई (Academic Performance Indicator) के आधार पर भर्ती और बाद में पदोन्नति दिए जाने के आरोप हैं। संगठन ने कहा कि कुछ मामलों में सहायक आचार्य से प्रोफेसर तक की पूरी पदोन्नति श्रृंखला अत्यंत कम समय में पूरी होने की जानकारी सामने आई है, जिसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
संगठन ने वर्ष 2020 के बाद हुई लगभग 186 शिक्षकों की नियुक्तियों का भी उल्लेख किया। एसएफआई ने कहा कि सीएजी रिपोर्ट संख्या 4 (2025) में इन नियुक्तियों से संबंधित अभिलेखों के सत्यापन पर गंभीर टिप्पणियाँ की गई हैं। एसएफआई द्वारा गठित अधिवक्ताओं की समिति ने भी प्रारंभिक अध्ययन में ऐसे मामलों की ओर संकेत किया है जिनमें संबंधित विषय में आवश्यक मास्टर डिग्री का अभाव, यूजीसी नियमों के विपरीत गेस्ट फैकल्टी अनुभव की गणना, न्यूनतम योग्यता प्राप्त करने से पूर्व का अनुभव जोड़ना, समाप्त अवधि वाले ओबीसी एवं ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्रों का उपयोग, आरक्षण रोस्टर में कथित अनियमितताएँ तथा नेट छूट प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पर प्रश्न उठे हैं। संगठन ने स्पष्ट किया कि वह किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं कर रहा, बल्कि इन सभी मामलों की स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग कर रहा है।
एसएफआई ने विश्वविद्यालय में निर्माण कार्यों और ईआरपी परियोजना में हुए खर्चों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। संगठन के अनुसार मल्टी फैकल्टी फेज-II तथा फेज-III भवनों की लागत प्रारंभिक स्वीकृत अनुमान से कहीं अधिक होने की जानकारी सामने आई है। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय के ईआरपी सिस्टम पर ₹40 करोड़ से अधिक खर्च होने तथा सीएजी द्वारा इस परियोजना पर गंभीर टिप्पणियाँ किए जाने का भी उल्लेख किया गया। संगठन ने कहा कि कई मॉड्यूल अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हुए हैं तथा उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग प्रक्रिया परीक्षा की गोपनीयता से जुड़े प्रश्न भी खड़े करती है। इसलिए ईआरपी परियोजना, डेटा सुरक्षा, अनुबंध अनुपालन और परीक्षा गोपनीयता की स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय जांच कराई जानी चाहिए।
एसएफआई ने कहा कि यदि भर्ती, पदोन्नति, निर्माण कार्यों और ईआरपी परियोजना से जुड़े आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति का बोझ विद्यार्थियों पर फीस वृद्धि के रूप में नहीं डाला जा सकता। प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं की कीमत छात्रों से वसूलना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है।
ज्ञापन के माध्यम से एसएफआई ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की कि प्रस्तावित फीस वृद्धि तत्काल वापस ली जाए, भर्ती, पदोन्नति, वित्तीय प्रबंधन एवं प्रशासनिक निर्णयों की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच कराई जाए, वर्ष 2010 से हुई सभी सीएएस पदोन्नतियों का स्वतंत्र ऑडिट किया जाए, वर्ष 2020 के बाद हुई नियुक्तियों की सीएजी रिपोर्ट के आलोक में समीक्षा हो, सभी प्रमुख निर्माण कार्यों एवं ईआरपी परियोजना का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए, विभागाध्यक्षों की नियुक्ति के लिए समान एवं पारदर्शी नीति बनाई जाए, संबद्ध महाविद्यालयों के निरीक्षण में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए, सूचना के अधिकार अधिनियम के अनुरूप सभी आवश्यक सूचनाएँ सार्वजनिक की जाएँ, नियमों के उल्लंघन के मामलों में जिम्मेदारी तय कर सार्वजनिक धन की वसूली की जाए तथा विश्वविद्यालय में व्यापक संस्थागत सुधार लागू किए जाएँ।
एसएफआई ने कहा कि उसका उद्देश्य विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को कम करना नहीं, बल्कि उसे और अधिक मजबूत बनाना है। संगठन ने कुलपति से आग्रह किया कि इन सभी मुद्दों को गंभीरता से लेते हुए उचित कार्रवाई प्रारंभ की जाए, ताकि विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों तथा पूरे समाज का विश्वविद्यालय पर विश्वास और अधिक मजबूत हो सके।
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