यंगवार्ता न्यूज़ - सोलन 29-10-2026
कथा के पंचम दिवस पर बड़ी संख्या में भक्तों ने कथा श्रवण कर प्रभु की भक्ति का आनंद प्राप्त किया। श्रीमद् भागवत महापुराण के दिव्य प्रसंगों के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, उनकी असीम कृपा और भगवान के नाम-स्मरण की महिमा का वर्णन किया। महाराज ने भक्तों को बताया कि वे नियमित रूप से सत्संग का श्रवण करें, प्रभु के नाम का स्मरण करें और अपने जीवन में सदाचार एवं भक्ति को अपनाएँ। कथा के इन भावपूर्ण प्रसंगों को सुनकर भक्त भावविभोर हो उठे और संपूर्ण कथा स्थल भक्तिमय वातावरण से गुंजायमान हो गया। कथा में भक्तों को गिरिराज भगवान की मासिक परिक्रमा कराई। इस पावन अवसर पर श्रद्धालुओं ने पूर्ण श्रद्धा, प्रेम और भक्ति भाव के साथ गिरिराज महाराज का स्मरण करते हुए परिक्रमा की।
चारों ओर गूंजते राधे-राधे के जयकारों और संकीर्तन से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। भक्तों ने गिरिराज भगवान के प्रति अपनी आस्था प्रकट की और सभी के सुख, शांति एवं कल्याण की कामना की। हर सनातनी को गौ माता की सेवा अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि गौ सेवा हमारी सनातन संस्कृति और संस्कारों का अभिन्न अंग है। गौ माता की सेवा करना, उन्हें भोजन और चारा खिलाना तथा उनकी रक्षा करना पुण्य का कार्य है। हमें केवल पूजा के समय ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में भी गौ माता के प्रति प्रेम, करुणा और सेवा का भाव रखना चाहिए। बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा देना ही नहीं, बल्कि उन्हें संस्कार और धर्म की शिक्षा देना भी बहुत जरूरी है। बचपन से ही बच्चों को रामायण, श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता और सनातन संस्कृति से जोड़ना चाहिए। बचपन में दिए गए संस्कार ही आगे चलकर बच्चे के चरित्र और भविष्य की नींव बनते हैं। जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है और धर्म की हानि होने लगती है, तब-तब भगवान धर्म की स्थापना और भक्तों की रक्षा के लिए धरती पर अवतरित होते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीमद्भगवद्गीता में यही संदेश दिया है कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब वे धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होते हैं। धर्म से बड़ा कोई सत्य नहीं है, क्योंकि धर्म ही हमें सत्य, प्रेम, करुणा और मानवता के मार्ग पर चलना सिखाता है। जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएँ, हमें कभी भी धर्म और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। संसार में धन, पद और प्रतिष्ठा सब कुछ अस्थायी है, लेकिन धर्म के मार्ग पर चलकर किए गए अच्छे कर्म सदैव मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाते हैं। मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति धन नहीं, बल्कि संस्कारवान संतान होती है। धन-संपत्ति समय के साथ घट-बढ़ सकती है, लेकिन अच्छे संस्कारों से युक्त बच्चे परिवार, समाज और राष्ट्र का भविष्य संवारते हैं। जिन बच्चों के जीवन में सत्य, सेवा, विनम्रता, अनुशासन, माता-पिता के प्रति सम्मान और भगवान के प्रति आस्था होती है, वे अपने माता-पिता का ही नहीं, पूरे समाज का नाम रोशन करते हैं। हर माँ को अपने बच्चे को माँ के दूध का अमृत अवश्य पिलाना चाहिए, क्योंकि माँ का दूध बच्चे के लिए प्रकृति का अनमोल उपहार है।
बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती छह महीने तक केवल माँ का दूध उसके पोषण और स्वस्थ विकास के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इसलिए हर माँ को अपने बच्चे के स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए और उसे अच्छे संस्कारों के साथ स्वस्थ जीवन देना चाहिए। जीवन में कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए , क्योंकि अभिमान मनुष्य के पतन का कारण बन सकता है। हमें अपनी सफलता, धन, ज्ञान या पद पर अहंकार करने के बजाय सदैव विनम्र और सरल बने रहना चाहिए। ईश्वर ने हमें जो कुछ भी दिया है, उसके लिए उनका आभार व्यक्त करते हुए सेवा, प्रेम और सद्भाव के मार्ग पर चलना चाहिए। दुःख में हम भगवान को कोसते हैं, लेकिन सुख में उन्हें याद करना भूल जाते हैं। याद रखिए, सच्ची भक्ति वही है जो सुख और दुख दोनों में भगवान का साथ न छोड़े। इसलिए हर परिस्थिति में प्रभु का स्मरण करें और उनका धन्यवाद करें।