एचपीयू शिमला ने विभिन्न जनजातीय बोलियों का त्रिभाषी शब्दकोश किया तैयार,सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का प्रयास
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के जनजातीय अध्ययन विभाग ने दस वर्षों की लंबी शोध प्रक्रिया के बाद प्रदेश की विभिन्न जनजातीय बोलियों का त्रिभाषी शब्दकोश तैयार किया है। इस शब्दकोश में 25 हजार से अधिक शब्दों का संकलन किया गया
यंगवार्ता न्यूज़ - शिमला 25-02-2026
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के जनजातीय अध्ययन विभाग ने दस वर्षों की लंबी शोध प्रक्रिया के बाद प्रदेश की विभिन्न जनजातीय बोलियों का त्रिभाषी शब्दकोश तैयार किया है। इस शब्दकोश में 25 हजार से अधिक शब्दों का संकलन किया गया है, जिन्हें स्थानीय भाषाओं से हिंदी और अंग्रेजी में अनुवादित किया गया है।
यह शब्दकोश केवल बोलियों का संकलन नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का प्रयास भी है। प्रदेश के कई दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों में बोली जाने वाली बोलियां आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के प्रभाव से धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं।
नई पीढ़ी के बीच इन बोलियों का प्रयोग घट रहा है। ऐसे समय में यह प्रयास भाषाई अस्मिता को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शब्दकोश तैयार करने के लिए विभाग की टीम ने प्रदेश के विभिन्न जनजातीय क्षेत्रों में व्यापक फील्ड सर्वे किया।
शोधकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर बुजुर्गों, लोकगायकों, पारंपरिक ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों और स्थानीय समुदायों से संवाद स्थापित किया। मौखिक परंपरा में प्रचलित शब्दों, लोक कथाओं, कृषि, पशुपालन, पर्व-त्योहार और रीति-रिवाजों से जुड़े शब्दों को सावधानीपूर्वक दर्ज किया गया। शब्दकोश में चंबा और पांगी घाटी, लाहौल, कुल्लू, सोलन, सिरमौर सहित अन्य जनजातीय क्षेत्रों में बोलियों के शब्द शामिल किए गए हैं।
कई ऐसे शब्द भी दर्ज किए गए हैं जिनका प्रयोग अब सीमित रह गया है और जो केवल बुजुर्ग पीढ़ी की स्मृतियों में सुरक्षित थे। दस वर्षों तक चले इस प्रकल्प में भाषाविज्ञान, लोकसंस्कृति और इतिहास के विशेषज्ञों ने संयुक्त रूप से कार्य किया। प्रत्येक शब्द के अर्थ, उच्चारण और संदर्भ को प्रमाणिक बनाने के लिए कई स्तरों पर जांच की गई।
अनुवाद प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया गया कि मूल शब्द का भावार्थ सुरक्षित रहे। विश्वविद्यालय के जनजातीय अध्ययन विभाग के अध्यक्ष चंद्र मोहन ने बताया कि यह त्रिभाषी शब्दकोश विद्यार्थियों, शोधार्थियों और भाषा-अध्येताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। जनजातीय अध्ययन, लोक साहित्य, समाजशास्त्र और मानवशास्त्र से जुड़े शोध कार्यों में इसे संदर्भ सामग्री के रूप में प्रयोग किया जा सकेगा।
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