विश्व पर्यावरण दिवस : प्रकृति से प्रेरणा लेकर अब आ गया है जलवायु परिवर्तन से मुकाबले का समय : डॉ. जीआर साहिबी

विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का विषय "प्रकृति से प्रेरित" (Inspired by Nature) रखा गया है, जो जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौती, प्रभावी जलवायु कार्रवाई तथा प्रकृति की जलवायु सहनशीलता (Climate Resilience) में भूमिका को रेखांकित करता है। वर्ष 2026 में वैश्विक स्तर पर इस दिवस की मेजबानी अज़रबैजान करेगा। यह विषय अत्यंत प्रासंगिक और समयानुकूल है

Jun 5, 2026 - 12:39
Jun 5, 2026 - 13:04
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विश्व पर्यावरण दिवस : प्रकृति से प्रेरणा लेकर अब आ गया है जलवायु परिवर्तन से मुकाबले का समय : डॉ. जीआर साहिबी
यंगवार्ता न्यूज़ - सोलन  05-06-2026
विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का विषय "प्रकृति से प्रेरित" (Inspired by Nature) रखा गया है, जो जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौती, प्रभावी जलवायु कार्रवाई तथा प्रकृति की जलवायु सहनशीलता (Climate Resilience) में भूमिका को रेखांकित करता है। वर्ष 2026 में वैश्विक स्तर पर इस दिवस की मेजबानी अज़रबैजान करेगा।
यह विषय अत्यंत प्रासंगिक और समयानुकूल है, किंतु केवल विषय निर्धारित कर देने से उद्देश्य पूरे नहीं होंगे। जैसा कि कहा जाता है, "कर्म शब्दों से अधिक प्रभावशाली होते हैं।" सार्थक परिणामों के लिए सरकारों, उद्योगों, नागरिक समाज संगठनों तथा आम नागरिकों को मिलकर ठोस और सतत प्रयास करने होंगे। औद्योगिक देशों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पर्यावरणीय क्षरण को बढ़ावा दिया है और तथाकथित पारिस्थितिकी ऋण (Ecological Debt) को जन्म दिया है। 
हालांकि जिम्मेदारियों को लेकर बहस जारी है, लेकिन दोषारोपण से समस्या का समाधान नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई ही समय की मांग है, क्योंकि इस चुनौती का प्रभाव पूरी मानवता पर पड़ रहा है। ओजोन परत का क्षरण और ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता पृथ्वी पर जीवन के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। बढ़ता वैश्विक तापमान खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा , आजीविका, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही जैव विविधता का ह्रास, प्राकृतिक आवासों का विनाश तथा अनेक प्रजातियों का विलुप्त होना भी चिंता का विषय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार जलवायु परिवर्तन अनेक बीमारियों के प्रसार को बढ़ावा देता है और स्वास्थ्य जोखिमों को बढ़ाता है। अत्यधिक गर्मी से हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय रोग, गुर्दा संबंधी बीमारियां और अन्य गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। बढ़ते तापमान के कारण वेक्टर जनित रोगों का भौगोलिक विस्तार भी बढ़ने की आशंका है। 
इसके अलावा मानसिक तनाव, चिंता, आक्रामकता और अवसाद जैसी समस्याओं में भी वृद्धि देखी जा रही है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों का नैतिक दायित्व है कि वे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और उसके अनुरूप अनुकूलन के लिए टिकाऊ रणनीतियां तथा नवाचारी समाधान विकसित करें, ताकि मानव समुदायों, वनस्पतियों, जीव-जंतुओं और पारिस्थितिक तंत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। आज विश्व पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में अभूतपूर्व जलवायु और मौसमीय परिवर्तनों का सामना कर रहा है। अम्लीकरण, मरुस्थलीकरण, वनाग्नि, कृषि उत्पादकता में गिरावट, हिमनदों का पिघलना, समुद्र स्तर में वृद्धि, अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, मृदा अपरदन और प्रजातियों का बड़े पैमाने पर पलायन इसके स्पष्ट संकेत हैं। 
ये परिवर्तन संसाधनों की कमी, कुपोषण और जल संकट को बढ़ावा दे रहे हैं। एक प्रसिद्ध कहावत है, "हम पृथ्वी अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं लेते, बल्कि इसे अपने बच्चों से उधार लेते हैं।" इसलिए पर्यावरण संरक्षण केवल विकल्प नहीं बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) के अनुसार, जलवायु परिवर्तन वह परिवर्तन है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण वैश्विक वायुमंडल की संरचना को प्रभावित करता है और प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता से अलग होता है।
 

पूर्व-औद्योगिक काल से अब तक प्रमुख ग्रीन हाउस गैसों की सांद्रता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है :-
 
 

कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) : लगभग 278 पीपीएम से बढ़कर 420 पीपीएम से अधिक।
मीथेन (CH₄) : लगभग 722 पीपीबी से बढ़कर 1900 पीपीबी से अधिक।
नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) : लगभग 271 पीपीबी से बढ़कर 335 पीपीबी से अधिक।
इसके अतिरिक्त क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs), परफ्लोरोकार्बन तथा सल्फर हेक्साफ्लोराइड जैसी गैसें अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं।
अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) बार-बार चेतावनी दे चुका है कि मानव गतिविधियों ने वैश्विक तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि कर दी है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इसके दुष्परिणाम और अधिक गंभीर होंगे।

ओजोन परत के क्षरण के दुष्प्रभाव भी व्यापक हैं :-
 
-त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और प्रतिरक्षा प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव।
-कृषि उत्पादकता में कमी।
-समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और मत्स्य संसाधनों पर नकारात्मक असर।
-प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) का क्षरण।
-समस्या का समाधान केवल तकनीक और नीतियों में नहीं, बल्कि जीवन शैली और उपभोग के पैटर्न में बदलाव में भी निहित है। महात्मा गांधी ने कहा था, 
-पृथ्वी प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लालच को नहीं।
-वैश्विक पर्यावरणीय शासन ने वियना कन्वेंशन, पृथ्वी सम्मेलन, UNFCCC, क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए हैं। ये समझौते सतत विकास और जलवायु कार्रवाई का मार्गदर्शन करते हैं, लेकिन उनकी सफलता प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
-भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने, वन क्षेत्र में वृद्धि, क्षतिग्रस्त भूमि के पुनर्स्थापन और जलवायु अनुकूलन उपायों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। फिर भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
-नदियां सभ्यता की जीवन रेखा है , लेकिन प्रदूषण, अतिक्रमण, अवैध खनन और अनियोजित शहरीकरण के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। समय रहते कदम उठाना आवश्यक है। जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन, प्रदूषण नियंत्रण और सतत नदी प्रबंधन की दिशा में तत्काल प्रयास किए जाने चाहिए।
नदियों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक अनिवार्यता भी है। स्वस्थ नदियां जैव विविधता को बनाए रखती हैं, भूजल पुनर्भरण करती हैं, कृषि को सहारा देती हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका सुनिश्चित करती हैं।

-सतत भविष्य के लिए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, हरित प्रौद्योगिकी, जलवायु-अनुकूल अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को अपनाना आवश्यक है। इसके साथ-साथ जनभागीदारी और सामुदायिक स्वामित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
-जलवायु परिवर्तन किसी के साथ भेदभाव नहीं करता, लेकिन इसका सबसे अधिक असर गरीबों, वंचित समुदायों और महिलाओं पर पड़ता है। सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों, नीति निर्माताओं और नागरिकों को मिलकर जलवायु सहनशीलता बढ़ाने, अनुकूलन उपायों को मजबूत करने, वनीकरण के माध्यम से कार्बन अवशोषण बढ़ाने और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए कार्य करना होगा।
-अनेक हाथ मिलकर कार्य को आसान बना देते हैं।" सामूहिक प्रयास, प्रभावी नीतियां और अटूट प्रतिबद्धता ही आने वाली पीढ़ियों के लिए खाद्य, जल, स्वास्थ्य और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती हैं।
-हमारे ग्रह का भविष्य आज हमारे द्वारा लिए गए निर्णयों पर निर्भर करता है। यदि हम अभी नहीं जागे, तो प्रकृति के प्रति अपनी उपेक्षा के लिए भविष्य हमें कभी माफ नहीं करेगा। समय आ गया है कि हम प्रकृति से प्रेरणा लें, उसके साथ सामंजस्य स्थापित करें और एक हरित, सुरक्षित तथा जलवायु-सहनशील भविष्य के निर्माण में अपना योगदान दें। 

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