विश्व पर्यावरण दिवस : प्रकृति से प्रेरणा लेकर अब आ गया है जलवायु परिवर्तन से मुकाबले का समय : डॉ. जीआर साहिबी
विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का विषय "प्रकृति से प्रेरित" (Inspired by Nature) रखा गया है, जो जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौती, प्रभावी जलवायु कार्रवाई तथा प्रकृति की जलवायु सहनशीलता (Climate Resilience) में भूमिका को रेखांकित करता है। वर्ष 2026 में वैश्विक स्तर पर इस दिवस की मेजबानी अज़रबैजान करेगा। यह विषय अत्यंत प्रासंगिक और समयानुकूल है
यह विषय अत्यंत प्रासंगिक और समयानुकूल है, किंतु केवल विषय निर्धारित कर देने से उद्देश्य पूरे नहीं होंगे। जैसा कि कहा जाता है, "कर्म शब्दों से अधिक प्रभावशाली होते हैं।" सार्थक परिणामों के लिए सरकारों, उद्योगों, नागरिक समाज संगठनों तथा आम नागरिकों को मिलकर ठोस और सतत प्रयास करने होंगे। औद्योगिक देशों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पर्यावरणीय क्षरण को बढ़ावा दिया है और तथाकथित पारिस्थितिकी ऋण (Ecological Debt) को जन्म दिया है।
पूर्व-औद्योगिक काल से अब तक प्रमुख ग्रीन हाउस गैसों की सांद्रता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है :-
कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) : लगभग 278 पीपीएम से बढ़कर 420 पीपीएम से अधिक।
मीथेन (CH₄) : लगभग 722 पीपीबी से बढ़कर 1900 पीपीबी से अधिक।
नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) : लगभग 271 पीपीबी से बढ़कर 335 पीपीबी से अधिक।
इसके अतिरिक्त क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs), परफ्लोरोकार्बन तथा सल्फर हेक्साफ्लोराइड जैसी गैसें अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं।
अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) बार-बार चेतावनी दे चुका है कि मानव गतिविधियों ने वैश्विक तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि कर दी है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इसके दुष्परिणाम और अधिक गंभीर होंगे।
ओजोन परत के क्षरण के दुष्प्रभाव भी व्यापक हैं :-
-कृषि उत्पादकता में कमी।
-समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और मत्स्य संसाधनों पर नकारात्मक असर।
-प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) का क्षरण।
-समस्या का समाधान केवल तकनीक और नीतियों में नहीं, बल्कि जीवन शैली और उपभोग के पैटर्न में बदलाव में भी निहित है। महात्मा गांधी ने कहा था,
-वैश्विक पर्यावरणीय शासन ने वियना कन्वेंशन, पृथ्वी सम्मेलन, UNFCCC, क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए हैं। ये समझौते सतत विकास और जलवायु कार्रवाई का मार्गदर्शन करते हैं, लेकिन उनकी सफलता प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
-भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने, वन क्षेत्र में वृद्धि, क्षतिग्रस्त भूमि के पुनर्स्थापन और जलवायु अनुकूलन उपायों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। फिर भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
-नदियां सभ्यता की जीवन रेखा है , लेकिन प्रदूषण, अतिक्रमण, अवैध खनन और अनियोजित शहरीकरण के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। समय रहते कदम उठाना आवश्यक है। जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन, प्रदूषण नियंत्रण और सतत नदी प्रबंधन की दिशा में तत्काल प्रयास किए जाने चाहिए।
नदियों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक अनिवार्यता भी है। स्वस्थ नदियां जैव विविधता को बनाए रखती हैं, भूजल पुनर्भरण करती हैं, कृषि को सहारा देती हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका सुनिश्चित करती हैं।
-सतत भविष्य के लिए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, हरित प्रौद्योगिकी, जलवायु-अनुकूल अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को अपनाना आवश्यक है। इसके साथ-साथ जनभागीदारी और सामुदायिक स्वामित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
-जलवायु परिवर्तन किसी के साथ भेदभाव नहीं करता, लेकिन इसका सबसे अधिक असर गरीबों, वंचित समुदायों और महिलाओं पर पड़ता है। सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों, नीति निर्माताओं और नागरिकों को मिलकर जलवायु सहनशीलता बढ़ाने, अनुकूलन उपायों को मजबूत करने, वनीकरण के माध्यम से कार्बन अवशोषण बढ़ाने और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए कार्य करना होगा।
-अनेक हाथ मिलकर कार्य को आसान बना देते हैं।" सामूहिक प्रयास, प्रभावी नीतियां और अटूट प्रतिबद्धता ही आने वाली पीढ़ियों के लिए खाद्य, जल, स्वास्थ्य और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती हैं।
-हमारे ग्रह का भविष्य आज हमारे द्वारा लिए गए निर्णयों पर निर्भर करता है। यदि हम अभी नहीं जागे, तो प्रकृति के प्रति अपनी उपेक्षा के लिए भविष्य हमें कभी माफ नहीं करेगा। समय आ गया है कि हम प्रकृति से प्रेरणा लें, उसके साथ सामंजस्य स्थापित करें और एक हरित, सुरक्षित तथा जलवायु-सहनशील भविष्य के निर्माण में अपना योगदान दें।
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