एम्स बिलासपुर के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में जल्द ही 8-कैपिलरी डीएनए सीक्वेंसर मशीने होगी स्थापित
एम्स बिलासपुर अब स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में और भी हाईटेक होने जा रहा है। संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में जल्द ही 8-कैपिलरी डीएनए सीक्वेंसर मशीन स्थापित की जाएगी
यंगवार्ता न्यूज़ - बिलासपुर 04-03-2026
एम्स बिलासपुर अब स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में और भी हाईटेक होने जा रहा है। संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में जल्द ही 8-कैपिलरी डीएनए सीक्वेंसर मशीन स्थापित की जाएगी।
लगभग एक करोड़ 10 लाख रुपये की लागत वाली इस मशीन के आने से प्रदेश के मरीजों को गंभीर और जेनेटिक बीमारियों की जांच के लिए अब दिल्ली या चंडीगढ़ के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। खास यह है कि कोरोना जैसे किसी भी नए वायरस के म्यूटेशन या वेरिएंट का पता अब बिलासपुर में ही लग जाएगा।
संस्थान ने इस मशीन की खरीद प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह मशीन सैंगर सीक्वेंसिंग तकनीक पर आधारित है, जिसे दुनिया भर में डीएनए की सटीक जांच के लिए गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है।
यह मशीन इंसान, वायरस या बैक्टीरिया के डीएनए की पूरी संरचना को कोड के रूप में पढ़ सकती है। इससे यह पता लगाना आसान हो जाता है कि शरीर में बीमारी की जड़ कहां है। यह मशीन पूरी तरह से ऑटोमेटिक है और एक साथ 8 अलग-अलग मरीजों के नमूनों की जांच करने में सक्षम है।
कैंसर के मरीजों के जीन में होने वाले बदलावों को पकड़कर डॉक्टर यह तय कर सकेंगे कि उन पर कौन सी दवा सबसे ज्यादा असर करेगी। बच्चों में माता-पिता से आने वाली अनुवांशिक बीमारियों जैसे थैलेसीमिया का समय रहते पता चल सकेगा।
पहले जिन टेस्ट की रिपोर्ट के लिए हफ्तों इंतजार करना पड़ता था, अब वे कुछ ही घंटों या दिनों में मिल सकेंगी। डॉक्टर अस्पताल के बाहर से भी मरीज की जेनेटिक रिपोर्ट को मोबाइल या लैपटॉप पर लाइव देख सकेंगे।
इस मशीन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि भविष्य में मरीजों की संख्या बढ़ने पर इसे अपग्रेड किया जा सकता है। इसमें वाई-फाई, यूएसबी और लैन की कनेक्टिविटी दी गई है, जिससे डेटा को सुरक्षित तरीके से स्टोर और साझा किया जा सकेगा। यह मशीन संस्थान के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी। इससे न केवल मरीजों को बेहतर डायग्नोसिस मिलेगा, बल्कि शोध के क्षेत्र में भी एम्स बिलासपुर नई ऊंचाइयों को छुएगा।
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