एसडीआरएफ ने खरीदे 34 नए सुरक्षा उपकरण, मानसून से पहले हाइटेक हुई स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स
हिमाचल प्रदेश की एसडीआरएफ (स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स) अब रबराइज्ड रेस्क्यू बोट्स,हाई-प्रेशर एयर कम्प्रेसर्स, इमर्जेंसी लाइटिंग टावर्स, डीप डाइविंग किट्स, एयर लिफ्टिंग बैग्स और कांग अल्पाइन से लैस होगी।
यंगवार्ता न्यूज मंडी 22 जून, 2026 :
हिमाचल प्रदेश की एसडीआरएफ (स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फोर्स) अब रबराइज्ड रेस्क्यू बोट्स,हाई-प्रेशर एयर कम्प्रेसर्स, इमर्जेंसी लाइटिंग टावर्स, डीप डाइविंग किट्स, एयर लिफ्टिंग बैग्स और कांग अल्पाइन से लैस होगी। खरीदे गए यह 34 नए सुरक्षा उपकरण आपदा की स्थिति में एसडीआरएफ को ताकत देंगे। हिमाचल प्रदेश में मानसून सीजन की शुरुआत से पहले राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल ने अपनी तैयारियों को और मजबूत कर लिया है। वर्तमान में एसडीआरएफ के पास 359 विभिन्न श्रेणियों के विशेषीकृत आपदा प्रतिक्रिया उपकरण उपलब्ध हैं, जिन्हें प्रदेश की विभिन्न इकाइयों में रणनीतिक रूप से तैनात किया गया है।
वर्ष 2023 और वर्ष 2025 में एसडीआरएफ ने इन्हीं उपकरणों की सहायता से कई जानें बचाई, तो कई शवों को मलबे से बाहर निकाला । मंडी जिला के थुनाग, कुल्लू, बिलासपुर में आपदा के दौरान एसडीआरएफ ने सर्च और रेस्क्यू मिशन किए थे। इन ऑपरेशनों में एसडीआरएफ के यह सुरक्षा उपकरण कारगर साबित हुए थे। खरीदे गए नए उपकरण विशेष रूप से बाढग़्रस्त क्षेत्रों में लोगों को सुरक्षित निकालने, गहरे पानी में खोज अभियान चलाने, अंधेरे या दुर्गम स्थानों पर राहत कार्य संचालित करने तथा घायल लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में मददगार साबित होंगे।
इस वर्ष एसडीआरएफ ने अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए कई अत्याधुनिक उपकरण खरीदे हैं। इनमें छह रबराइज्ड रेस्क्यू बोट्स, तीन हाई-प्रेशर एयर कम्प्रेसर्स, तीन एमर्जेंसी लाइटिंग टावर्स, 12 डीप डाइविंग किट्स, चार एयर लिफ्टिंग बैग्स और छह कांग अल्पाइन स्ट्रेचर्स शामिल हैं।
एसपी एसडीआरएफ अर्जित सेन का कहना है कि मानसून के दौरान पूरी टीम 24&7 अलर्ट पर रहेगी। किसी भी आपदा की सूचना मिलते ही राहत और बचाव दल तत्काल मौके पर पहुंचकर कार्रवाई करेगा।
वर्ष 2023 से लगातार हिमाचल प्रदेश में मानसून के दौरान भू-स्खलन, बादल फटना, बाढ़ और सडक़ अवरोध जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। 2023 में लगभग 428 लोगों की जानें गई। 2024 में लगभग 300 मौतें और 2025 में लगभग 400 मौतें हुई हैं। दुर्गम क्षेत्रों में राहत एवं बचाव कार्य चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
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