राष्ट्रपति के दरबार पहुंचा राष्ट्रीय राजमार्गों से टोल प्लाजा हटाने का मुद्दा , संघर्ष समिति ने दायर की 80 पन्नों की याचिका

हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थापित टोल प्लाजाओं को हटाने की मांग अब राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गई है। इस मामले को लेकर राष्ट्रपति के समक्ष करीब 80 पन्नों की विस्तृत याचिका दायर की गई है, जिसमें प्रदेश के विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों पर वसूले जा रहे टोल को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। याचिका में कहा गया है कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में सीमित दूरी के भीतर कई टोल प्लाजा स्थापित किए गए हैं

Jul 18, 2026 - 14:28
Jul 18, 2026 - 14:56
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राष्ट्रपति के दरबार पहुंचा राष्ट्रीय राजमार्गों से टोल प्लाजा हटाने का मुद्दा , संघर्ष समिति ने दायर की 80 पन्नों की याचिका
यंगवार्ता न्यूज़ - शिमला  18-07-2026
हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थापित टोल प्लाजाओं को हटाने की मांग अब राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गई है। इस मामले को लेकर राष्ट्रपति के समक्ष करीब 80 पन्नों की विस्तृत याचिका दायर की गई है, जिसमें प्रदेश के विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों पर वसूले जा रहे टोल को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। याचिका में कहा गया है कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में सीमित दूरी के भीतर कई टोल प्लाजा स्थापित किए गए हैं, जिससे स्थानीय लोगों, व्यापारियों, कर्मचारियों और रोजाना सफर करने वाले यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कई स्थानों पर टोल वसूली नियमों और निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है। 
याचिका के माध्यम से राष्ट्रपति से मांग की गई है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगाए गए टोल बैरियरों की वैधता की समीक्षा कर उन्हें हटाने के लिए केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों को आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि टोल प्लाजा के कारण आम लोगों को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ बार-बार जाम और समय की बर्बादी का भी सामना करना पड़ता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया है कि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए सड़कें एक बुनियादी आवश्यकता हैं और उन पर अत्यधिक टोल वसूली जनहित के विपरीत है। इस मामले के राष्ट्रपति तक पहुंचने के बाद अब सभी की नजर केंद्र सरकार और संबंधित विभागों की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई है। यदि इस याचिका पर संज्ञान लिया जाता है तो हिमाचल में टोल व्यवस्था को लेकर व्यापक स्तर पर समीक्षा की संभावना बन सकती है।  
बताते है कि किसान और सामाजिक संगठनों की संयुक्त संघर्ष समिति ने इस मुद्दे को राष्ट्रपति भवन तक पहुंचाते हुए 80 पन्नों की विस्तृत संवैधानिक याचिका दायर की है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 256 और 257 के तहत हिमाचल प्रदेश सरकार को निर्देश जारी कर राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थापित सभी टोल बैरियर हटाने और टोल वसूली बंद कराने की मांग की गई है। संघर्ष समिति के कानूनी सलाहकार एवं हाईकोर्ट के अधिवक्ता उत्तांश मोंगा ने यह याचिका दाखिल की है, जिसे औपचारिक रूप से पंजीकृत भी कर लिया गया है। संयुक्त संघर्ष समिति में गौरव राणा के नेतृत्व वाला पंजाब मोर्चा , कश्मीर सिंह नांगली के नेतृत्व वाली जन कल्याण समिति (आनंदपुर साहिब), कीर्ति किसान मोर्चा के वीर सिंह भरवा और हरप्रीत सिंह भट्टू, किसान नेता सेठी शर्मा, किसान यूनियन बेहराम के करणवीर सिंह सहित कई किसान और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं। 
 
 
 
 
याचिका में तर्क दिया गया है कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल लगाने और वसूलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची की संघ सूची (यूनियन लिस्ट) की प्रविष्टि 23 और 96 के तहत विशेष रूप से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के पास राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल लगाने का विधायी अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हिमाचल प्रदेश टोल अधिनियम, 1975 और उसके तहत बनाई गई नीतियों के आधार पर राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल वसूली संविधान के भाग-11 में निर्धारित केंद्र-राज्य शक्तियों के विभाजन के विपरीत है। यह अनुच्छेद 254 के तहत भी गंभीर सांविधानिक प्रश्न खड़े करता है। याचिका में राष्ट्रपति से अनुरोध किया गया है कि वह अनुच्छेद 256 के तहत हिमाचल सरकार को संसद की ओर से बनाए गए राष्ट्रीय राजमार्ग संबंधी कानूनों और संविधान के अनुरूप कार्य करने के निर्देश दें। 
 
 
 
 
यह सुनिश्चित किया जाए कि राज्य सरकार की कार्यवाही केंद्र सरकार की कार्यपालिका शक्तियों में बाधा न डाले। याचिका में एनएचएआई मंडी इकाई के परियोजना निदेशक द्वारा भेजे गए पत्रों और दस्तावेजों का भी उल्लेख किया गया है। दावा किया गया है कि एनएचएआई ने कई बार हिमाचल सरकार से राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थापित टोल बैरियर हटाने का अनुरोध किया था। याचिका के अनुसार ये बैरियर राष्ट्रीय राजमार्गों के संचालन, रखरखाव, विकास और प्रशासन में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं तथा राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत केंद्र सरकार द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों के निर्वहन को प्रभावित कर रहे हैं।
 

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