धर्म का एक दशक: मोदी युग में सांस्कृतिक पुनर्जागरण : गजेन्द्र सिंह

जनवरी 2024 में जब पावन नगरी अयोध्या में सूर्योदय हुआ।सदियों से लुप्त हो चुकी प्रार्थना अब आखिरकार गुंजायमान होने लगी थी। श्री राम की अपने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा महज एक धार्मिक उपलब्धि नहीं थी। यह सभ्यता के उद्धार का क्षण था

Jun 18, 2025 - 12:45
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धर्म का एक दशक: मोदी युग में सांस्कृतिक पुनर्जागरण : गजेन्द्र सिंह
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यंगवार्ता न्यूज़ - शिमला      18-06-2025

जनवरी 2024 में जब पावन नगरी अयोध्या में सूर्योदय हुआ।सदियों से लुप्त हो चुकी प्रार्थना अब आखिरकार गुंजायमान होने लगी थी। श्री राम की अपने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा महज एक धार्मिक उपलब्धि नहीं थी। यह सभ्यता के उद्धार का क्षण था। सदियों के आक्रमण, औपनिवेशिक विकृति और राजनीतिक देरी के बाद, मंत्रों से गूंजता हुआ और इतिहास के स्पंदन सहित, बलुआ पत्थर में उकेरा गया यहमंदिर शान से खड़ा था। 

यह सिर्फ वास्तुकला के बारे में नहीं था,यह एक घायल आत्मा के उपचार के बारे में था। श्री राम की अपनी जन्मभूमि पर वापसी ने उस राष्ट्र की आस्था को फिर से जागृत कर दिया, जिसने लंबे समय तक अपने दिल में निर्वासन की खामोशी को समेटे रखा था। कुछ महीने पहले, भारत की प्राचीन आस्था का एक और प्रतीक चुपचाप अपने सही स्थान पर लौट आया। 

नई संसद के उद्घाटन के दौरान, प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने सेंगोल कोस्थापित किया।यह एक पवित्र राजदंड है, जिसे 1947 में तमिल अधीनमों ने सत्ता के धार्मिक हस्तांतरण को चिह्नित करने के लिए जवाहरलाल नेहरू को भेंट किया था। दशकों से, इसे भुला दिया गया था, समुचित स्थान से वंचित किया गया, और एक प्रचलितराजदंड के तौर पर खारिज कर दिया गया था। 

इसकी स्थापना केवल स्मरण का कार्य नहीं था - यह एक शक्तिशाली घोषणाथी कि भारत अब खुद को उधार की आंखों से नहीं देखेगा। सेंगोल ने साम्राज्य के अवशेषों का नहीं, बल्कि धार्मिकता पर आधारित शासन का प्रतिनिधित्व किया।यह भारत की अपनी राज्य कला और आध्यात्मिक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण आलिंगन था, जिसे उपनिवेशवाद के बाद के क्रम में लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया था।

इतना ही नहीं, इन क्षणों ने एक गहरे सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत दिया।यह एक सभ्यतागत गतिविधि के तौर पर ग्यारह परिवर्तनकारी वर्षों में सामने आएगी। 2014 में शुरू से ही यह स्पष्ट था कि मोदी सरकार के तहत संस्कृति अब सजावटी नहीं रहेगी, बल्कि यह मूलभूत होगी। अंतरराष्ट्रीय योग दिवसपहली बार 2015 में मनाया गया था। 

अब दुनिया भर में लाखों लोगों को एक प्राचीन भारतीय परंपरा का जश्न मनाते देखा जा रहा है, जो शरीर, मन और आत्मा को आपस में जोड़ता है। योग केवल एक स्वास्थ्य संबंधी दिनचर्या भर नहीं है,बल्कि यह पिछले कुछ वर्षों में भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक निर्यात भी बन गया है।

आयुष मंत्रालय के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के पुनरुद्धार को संस्थागत बल दिया गया।इसके परिणामस्वरूप आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी को राष्ट्रीय और वैश्विक मंचों पर पहुंचने में मदद मिली। 

समानांतर रूप से, सरकार ने संस्कृत, तमिल, पाली और प्राकृत जैसी शास्त्रीय भाषाओं को संरक्षित करने, पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने और उस्तादएवं हमारी धरोहर जैसी योजनाओं के तहत लुप्तप्राय लोक कलाओं और शिल्पों का समर्थन करने के लिए मिशन शुरू किए।

भारत की ऐतिहासिकों इमारतों में भी नई जान आ गई। 2018 में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का अनावरण केवल व्यापकता के बारे में नहीं था,बल्कि एक गाथा को पुनः प्रतिष्ठित करने जैसा था। सरदार वल्लभभाई पटेललंबे समय से ओझल हो रहे थे।उनको राष्ट्रीय स्मृति में सबसे आगे रखा गया। राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ करना एक निर्णायक बदलाव का प्रतीक था। यह औपनिवेशिक प्रतीकवाद से देशी जवाबदेही की ओरबदलाव का भी प्रतीक था।

इन वर्षों के दौरान, 600 से अधिक चोरी की गई कलाकृतियांविदेशी संग्रहालयों और संग्रहकर्ताओं से वापस लाई गईं, जिनमें मूर्तियां, शिलालेख और पांडुलिपियां शामिल हैं। इनमें से प्रत्येक की वापसी न केवल कला की बल्कि सम्मान की बहाली थी। इसी तरह, गुरु गोविंद सिंह के वीरशहजादों की शहादत को याद करने के लिए वीर बाल दिवस की स्थापना की गई, जबकि जनजातीय गौरव दिवस ने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को राष्ट्रीय केन्द्र में लाया।

महामारी भी सांस्कृतिक लौ को मद्धिम नहीं कर पाई। वर्चुअल कॉन्सर्ट, डिजिटल म्यूजियम टूर और“मनकीबात”केमाध्यमसे, प्रधानमंत्री ने सुनिश्चित किया कि कला, कहानियां और सांस्कृतिक गौरव लॉकडाउन के एकांत में भी पुष्पित-पल्लवित होते रहें।

“विकासभी, विरासत भी”के नारे जैसेअभियान में ये सभीसमाहित हो गए।यह एकआह्वानहै जो आर्थिकविकासकोसांस्कृतिकगौरवकेसाथ-साथचलने पर जोर देता है।मोदीसरकारकेतहत, यह नारा केवल बयानबाजी नहीं था। इसने एक नई दृष्टि को परिभाषित किया। एक दृष्टि,जिसमेंजीडीपी वृद्धि, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और रक्षा आधुनिकीकरण,मंदिर जीर्णोद्धार, आदिवासी गौरव और सभ्यता की गाथा समाहित थे।

भारत आज अपनी पहचान के इर्द-गिर्द नहीं घूमता। बिना किसी पछतावें और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होकर यह आगे बढ़ता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवादप्रगति की बाध्यकारी शक्ति के रूप में उभरा है, जिसे कभी प्रतिगामी के रूप में खारिज कर दिया गया था। भाजपा के वैचारिक कम्पास में, संस्कृति केवल एक सहायक भर नहीं है, बल्कि धुरी है।

 इन ग्यारह सालों में मोदी युग ने केवल सांस्कृतिक नीति को ही ध्यान में नहीं रखा है, बल्कि इसने सांस्कृतिक चेतना को भी जागृत किया है। जो पुनर्स्थापना के तौर पर शुरू हुआ था, वह पुनरुत्थान बन गया। जिन्हें कभी अतीत की स्मृतियों के तौर पर उपेक्षित किया जाता था, वे सभी अब राष्ट्रीय पहचान के केंद्र बन गए हैं।

राम मंदिर और सेंगोल हमेशा सांकेतिक प्रतीक बने रहेंगे, लेकिन विरासत की गहराई सामूहिक अहसास में निहित है।भारत का भविष्य तब सबसे उज्ज्वल होगा, जब वह याद रखेगा कि वह कहां से आया है। हम सिर्फ एक लंबा इतिहास वाला देश नहीं हैं, बल्कि हम एक लंबी स्मृति वाली जीवित सभ्यता हैं। और उस स्मृति में, धर्म की निगरानी में, भारत ने फिर से अपनी आवाज पाई है।

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