हिमाचल में सरकारी कर्मचारियों की भर्ती एवं सेवा शर्तें विधेयक, 2024 पर विचार करवाने के लिए राज्यपाल से मिला शिक्षक संघ

हिमाचल प्रदेश राजकीय महाविद्यालय प्राध्यापक संघ का प्रतिनिधिमंडल अध्यक्ष डॉ बनीता सकलानी की अध्यक्षता में हाल ही में सरकार द्वारा पारित किए गए हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की भर्ती एवं सेवा शर्तें विधेयक, 2024’ पर  विचार करवाने के लिए महामहिम राज्यपाल से मिला। प्रतिनिधिमंडल ने महामहिम के समक्ष प्रदेश के एक लाख तीस हजार कर्मचारी जो इस बिल से प्रभावित हुए है, उनकी  चिंताएं लिखित रूप में अभिवेदन के माध्यम से प्रस्तुत की। संक्षिप्त चर्चा में महामहिम के समक्ष बिल के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से रखा और कहा कि प्रदेश को विकासोन्मुखी एवं प्रगति पथ पर ले जाने में कर्मचारियों की अग्रणी भूमिका रहती है

Jan 23, 2025 - 18:39
Jan 23, 2025 - 18:55
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हिमाचल में सरकारी कर्मचारियों की भर्ती एवं सेवा शर्तें विधेयक, 2024 पर विचार करवाने के लिए राज्यपाल से मिला शिक्षक संघ
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यंगवार्ता न्यूज़ - शिमला  23-01-2025
हिमाचल प्रदेश राजकीय महाविद्यालय प्राध्यापक संघ का प्रतिनिधिमंडल अध्यक्ष डॉ बनीता सकलानी की अध्यक्षता में हाल ही में सरकार द्वारा पारित किए गए हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की भर्ती एवं सेवा शर्तें विधेयक, 2024’ पर  विचार करवाने के लिए महामहिम राज्यपाल से मिला। प्रतिनिधिमंडल ने महामहिम के समक्ष प्रदेश के एक लाख तीस हजार कर्मचारी जो इस बिल से प्रभावित हुए है, उनकी  चिंताएं लिखित रूप में अभिवेदन के माध्यम से प्रस्तुत की। संक्षिप्त चर्चा में महामहिम के समक्ष बिल के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से रखा और कहा कि प्रदेश को विकासोन्मुखी एवं प्रगति पथ पर ले जाने में कर्मचारियों की अग्रणी भूमिका रहती है। उस भूमिका का निर्वहन प्रत्येक कर्मचारी कर्तव्यपरायणता व तन्मयता के साथ सदैव करता है जो सर्वव्यापी सत्य है लेकिन उपरोक्त विधेयक प्रदेश के लाखों कर्मचारियों में उद्विग्न की बाधा उत्पन्न कर रहा है। कर्मचारी सरकार का अभिन्न अंग होता है, लेकिन पिछले कुछ समय से कर्मचारी हितों की अनदेखी के चलते मजबूरन उच्च न्यायलय का रुख करना पड़ा है। 
माननीय उच्च न्यायालय हिमाचल प्रदेश ने अनुबंध सेवाओं से नियमित किए गए कर्मचारियों के पक्ष में कई फैसले सुनाए हैं तथा सरकार को वेतन वृद्धि , वरिष्ठता , पेंशन , पदोन्नति और अन्य परिणामी लाभों के लिए अनुबंध सेवा को भी शामिल करने का निर्देश दिया है। जिसके लिए कर्मचारी माननीय उच्च न्यायालय के प्रति कृतज्ञता प्रेषित करता है। तथापि, उपरोक्त पारित विधेयक में संविदा सेवा अवधि अर्थात अनुबंध  सेवा काल को पदोन्नति, वरिष्ठता, पेंशन, प्रोन्नति या अन्य परिणामी लाभों के लिए न गिने जाने बारे में व्याख्या करता है, जो पूर्णतः आपत्तिपूर्ण है। उपर्युक्त विधेयक के लागू होने से राज्य के लगभग एक लाख तीस हज़ार कर्मचारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, ये वो कर्मचारी है, जिन्हें अनुबंध सेवाओं से नियमित किया गया है। अनुबंध पर नियुक्ति हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की सिफारिशों के अनुरूप, विधिवत स्वीकृत पदों के आधारगत भर्ती नियमों के अनुसार की गई हैं, न कि पिछले दरवाजे से। लेकिन,इस विधेयक के प्रावधान उन्हें सार्वजनिक सेवाओं का हिस्सा मानने से इनकार करते हैं। प्रदेश में अनुबंध व संविदा सेवा की अवधि प्रत्येक बैच के लिए  अलग-अलग रही है। 
कानून का उल्लंघन करते हुए, राज्य ने लंबी अवधि के लिए संविदा नियुक्तियां जारी रखीं। कर्मचारियों  को संविदा सेवा के लाभ से वंचित करना राज्य की अवैधताओं को कायम रखता है और बढ़ावा देता  है। कर्मचारियों को संविदा सेवा का लाभ न देना संवैधानिक गारंटी के विपरीत है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। राज्य सरकार द्वारा संविदा सेवाओं का लाभ न देने के बाद, कर्मचारियों ने अपना मुद्दा माननीय न्यायालयों में उठाया। माननीय न्यायालयों ने कर्मचारियों के पक्ष में कई फैसले दिए। अतः विधेयक के प्रावधान न्यायालय के आदेशों का खंडन करते हैं या उन्हें निरस्त करते हैं। यह माननीय न्यायालय के महत्व को कम करता है अथवा  यहां तक ​​कि न्यायालय की अवमानना ​​भी करता है। किसी भी विधेयक या अधिनियम से कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत किया जाना चाहिए न कि कमजोर। जबकि, मौजूदा विधेयक भारतीय संविधान के  समान कार्य हेतु  समान वेतन की अवधारणा का सरेआम उल्लंघन करता है। विधेयक के प्रावधान [खण्ड 6 (1 और 2)] पूर्वव्यापी रूप से प्रस्तावित हैं और कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। 
इसे वर्ष 2003 से लागू करने से कर्मचारियों को कई तरह की मुशक्कतों का सामना करना पड़ेगा। यहाँ तक कि कुछ मामलों के याचिकाकर्ताओं को  माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार  पदोन्नति  के साथ -साथ  अन्य लाभ अन्य लाभ मिल चुके हैं। पदोन्नत और सेवानिवृत्त कर्मचारियों से लाभ वापस लेने से न्यायालय में कई मामले आएंगे और विधेयक का उद्देश्य विफल हो जाएगा। इसके अलावा, किसी कर्मचारी द्वारा दी गई सेवाओं के लिए मौद्रिक लाभ या अन्य सेवा लाभ वापस लेना अमानवीय है और इससे कर्मचारियों को मानसिक कष्ट एवं प्रताड़ना होगी। इतना ही नहीं बल्कि, पूर्वव्यापी कानून के माध्यम से कर्मचारी लाभों को समाप्त करने का प्रयास बहुत नकारात्मक मिसाल कायम करेगा। वर्ष, 2003 से हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, सरदार पटेल विश्वविद्यालय, मंडी और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में कॉलेज कैडर के कई शिक्षकों की भर्ती हुई  है। जहाँ उन्हें संविदा सेवा का लाभ दिया गया है, तथा उनकी संविदा सेवा की अवधि को स्क्रीनिंग स्कोर में अनुभव के रूप में माना गया है। 
जिससे विश्वविद्यालय में संबंधित पदों के लिए उनकी पात्रता स्थापित हुई है। ऐसे में उपरोक्त कर्मचारी अब अपने वर्तमान पदों के लिए पात्र नहीं होंगे और उनकी भर्ती पर सवाल उठेंगे क्योंकि विधेयक में कहा गया है कि संविदा सेवाएं सार्वजनिक क्षेत्र का हिस्सा नहीं हैं। इस विधेयक के परिणामस्वरूप, इन कर्मचारियों का भविष्य क्या होगा? यह चिंतनीय विषय है। इसके अतिरिक्त, डायरेक्ट रिक्रूट (सीधी भर्ती) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने संविदा सेवा की गणना के सिद्धांत निर्धारित किए हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कई अध्यादेशों को खारिज कर दिया है जो न्यायालय की अवमानना ​​या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और माना है कि अध्यादेशों का उपयोग विधायी प्रक्रिया को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता है। ‘हिमाचल प्रदेश भर्ती और सेवा शर्तें विधेयक, 2024’ कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। विधेयक असंवैधानिक है और कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का हनन है इसलिए संघ ने महामहिम से सरकार से विधेयक के प्रावधानों पर फिर से विचार करने और हितधारकों के साथ उनके संगठनों के माध्यम से बातचीत करने का निर्देश देने की गुजारिश की। 

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