यंगवार्ता न्यूज़ - शिमला 29-01-2026
बदलते परिवेश के बावजूद भी क्योंथल क्षेत्र में बुआरा प्रथा की परंपरा आज भी कायम है। बुआरा का तात्पर्य ग्रामीण क्षेत्रों में खेेतीबाड़ी के कार्याें में एक दूसरे की मदद करना हैं। बारिश होने के उपरांत इन दिनों किसान अपने खेत में गोबर ढोने सहित अन्य खेती के कार्यों में जुटे हुए हैं और खेतों में गोबर ढोने के लिए गांव के युवा अपना सहयोग अर्थात बुआरा कर रहे है जोकि सहकारिता का एक जीवंत उदाहरण माना जाता है। बुआरा अर्थात प्रथा से ही हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला के गांव पंजावर से सहकारिता आन्दोलन की नींव रखी गई थी जिसका अनुसरण देश के सभी राज्यों द्वारा किया गया है।
गौर रहे कि अतीत से ही ग्रामीण क्षेत्रों में एक दूसरे की मदद करने की सकारात्मक भावना होती थी। गांव में धार्मिक व समाजिक कार्यों में तो लोग बढ़चढ़ कर अहम भूमिका निभाते ही हैं परंतु व्यक्तिगत तौर पर यदि कोई व्यक्ति खेती बाड़ी के कार्य में पिछड़ जाए तो गांव के सभी लोक मिलकर सहायता करते हैं। वरिष्ठ नागरिक दयाराम वर्मा, दौलत राम मेहता , जबर सिंह ठाकुर ने बताया कि भौतिकवाद और आधुनिकता की दौड़ में बुआरा प्रथा का प्रचलन काफी कम होने लगा है इसके बावजूद भी बुआरा प्रथा ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कायम है। इनका कहना है कि गांव में खेत में गोबर ढोने, घास काटने, मक्की की गुड़ाई करने इत्यादि कार्याें के लिए बुआरा किया जाता है जिसमें हर घर से एक व्यक्ति अनिवार्य रूप से भाग लेते हैं। जबकि गांव के सामूहिक कार्य में लोगों द्वारा दिए गए सहयोग को हैल्ला कहते हैं।
उन्होने कहा कि बुआरा अथवा हैल्ला के दौरान लोग आपस में पहाड़ी भाषा में हास्य व व्यंग्य का खूब दौर चलता है। जो कि अतीत में मनोरंजन का एक प्राकृतिक साधन हुआ करता था अर्थात काम करते हुए हंसी मजाक के महौल खुशनुमा बन जाता है। दूसरी ओर जिस घर में बुआरा किया जाता है वहां पर रात्रि को पहाड़ी व्यंजन बनाए जाते है और सभी बुआरा में आए लोग व बच्चे एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं। समाजिक सारोकार से जुड़ी इस प्रथा में लोगों में आपसी प्यार, सदभावना और पारस्परिक सहयोग की भावना उत्पन्न होती है जिससे राष्ट्र की एकता और अखंडता को बल मिलता है।