आधुनिक तकनीक के साथ उन्नत खेती अपनाएं किसान , प्रसार शिक्षा निदेशालय चौधरी कृषि विश्वविद्यालय ने जारी एडवायजरी 

प्रसार शिक्षा निदेशालय चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर ने जनवरी , 2026 माह के प्रथम पखवाड़े में किये जाने वाले मौसम पूर्वानुमान सम्बन्धित कृषि एवं पशुपालन कार्यों के बारे में निम्नलिखित सलाह दी जा रही है , जो किसानों को लाभप्रद साबित होगी। गेहूँ की फसल में खरपतवारों पर 2-3 पत्तियां आ गई हो। इस अवस्था में दोनों प्रकार के खरपतवार नियंत्रण के लिए वेस्टा ( मेटसल्फयूरॉन मिथाईल 20 डव्ल्यूपी + क्लोडिनाफाॉप प्रोपार्जिल 15 डव्ल्यूपी ) 16 ग्राम प्रति 30 लीटर पानी प्रति कनाल के हिसाब से खेतों में छिड़काव करें। केवल चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नियंत्रण के लिए 2,4-डी की 50 ग्राम मात्रा को 30 लीटर पानी में घोल बनाकर एक कनाल में छिड़काव करें

Jan 2, 2026 - 19:27
Jan 2, 2026 - 20:02
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आधुनिक तकनीक के साथ उन्नत खेती अपनाएं किसान , प्रसार शिक्षा निदेशालय चौधरी कृषि विश्वविद्यालय ने जारी एडवायजरी 
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यंगवार्ता न्यूज़ - पांवटा साहिब  02-01-2025

प्रसार शिक्षा निदेशालय चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर ने जनवरी , 2026 माह के प्रथम पखवाड़े में किये जाने वाले मौसम पूर्वानुमान सम्बन्धित कृषि एवं पशुपालन कार्यों के बारे में निम्नलिखित सलाह दी जा रही है , जो किसानों को लाभप्रद साबित होगी। गेहूँ की फसल में खरपतवारों पर 2-3 पत्तियां आ गई हो। इस अवस्था में दोनों प्रकार के खरपतवार नियंत्रण के लिए वेस्टा ( मेटसल्फयूरॉन मिथाईल 20 डव्ल्यूपी + क्लोडिनाफाॉप प्रोपार्जिल 15 डव्ल्यूपी ) 16 ग्राम प्रति 30 लीटर पानी प्रति कनाल के हिसाब से खेतों में छिड़काव करें। केवल चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नियंत्रण के लिए 2,4-डी की 50 ग्राम मात्रा को 30 लीटर पानी में घोल बनाकर एक कनाल में छिड़काव करें। छिड़काव के लिए फ्लैट फैन नोजल इस्तेमाल करें। गेहूँ के साथ चौड़ी पत्ती वाली फसल की खेती की गयी हो तो 2,4-डी का प्रयोग न करें। गेहूँ की फसल में पीला रतुआ बीमारी आने के प्रति भी सचेत रहें। 
इस रोग में गेहूँ के पत्तों पर पीले रंग के छोटे-2 दाने सीधे धारिओं में प्रकट होते है व दूसरी ओर पत्तों में धारीदार पीलापन दिखाई देता है। बीमारी के जल्दी प्रकट हाने पर पौधे बौने रह जाते हैं व पैदावार पर प्रतिकूल असर पड़ता है। यदि मौसम ठण्डा व नम रहे व थोड़ी वर्षा हो जाए तो यह रोग महामारी का रूप धारण कर सकता है। बीमारी के कारण गेहूँ के दाने या तो बनते ही नहीं है या छोटे व झुर्रीदार बनते हैं। फिर भी जहां पर किसानों ने पीबीडब्ल्यू-343, पीबीडब्ल्यू-520, पीबीडब्ल्यू-550, एचपीडब्ल्यू-184, एचपीडब्ल्यू-42, एचएस-240, एचएस-295 , एचएस-420, यूपी-2338 या डब्ल्यूएच-711 किस्मों की बिजाई की है, ऐसे क्षेत्रों में किसानों को बीमारी के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है। किसानों को यह सलाह दी जाती है कि ऊपर बताए गए लक्षणों को देखते ही गेहूं की फसल में टिल्ट - प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी या फोलिक्योर टेबुकोनाजोल 25 ईसी या बेलाटॉन 25 डब्ल्यूपी का 0.1 प्रतिशत घोल यानि 30 मि.ली. रसायन 30 लीटर पानी में घोलकर प्रति कनाल की दर से छिड़काव करें व 15 दिन के अन्तराल पर इसे फिर से दोहराएं। मध्यवर्ती क्षेत्रों में आलू की बुआई के लिए सुधरी किस्मों जैसे कुफरी ज्योति, कुफरी गिरिराज, कुफरी चन्द्रमुखी व कुफरी हिमालिनी इत्यादि का चयन करें। 
बुआई के लिए स्वस्थ , रोग रहित , साबुत या कटे हुए कन्द , वजन लगभग 30 से 50 ग्राम, जिनमें कम से कम 2 से 3 आंखें हों का प्रयोग करें। बुआई से पहले कन्दों को डाइथेन एम-45 (25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी) के घोल में 20 मिनट तक उपचारित करें। कंद को छाया में सुखाने के बाद अच्छी तरह से तैयार खेतों में 45-60 सेंटीमीटर पंक्तियों की दूरी एवं कंद को 15-20 सेंटीमीटर के अंतर पर पंक्ति में मेढ़े बनाकर बीजाई करें। बुवाई से पहले 10 क्विंटल गोबर की खाद के अतिरिक्त 10 किग्रा इफको (12:32:16) मिश्रण खाद तथा 2.5 किग्रा. यूरिया प्रति कनाल अंतिम जुताई के समय खेतों में डालें। आलू की रोपाई के एक सप्ताह बाद खरपतवार नियंत्रण के लिए ऑक्सीफ्लुरफेन 6 ग्राम प्रति कनाल या 3 से 4 सप्ताह बाद मेट्रीब्यूजीन 30 ग्राम प्रति कनाल (30 लीटर पानी में घोलकर) का छिड़काव करें। छिड़काव करते समय खेत में नमी होना चाहिए। इसके अलावा आलू के 5 प्रतिशत अंकुरण होने पर खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्रामेक्सॉन या पैराक्वेट 90 मिली लीटर प्रति कनाल (30 लीटर पानी) का छिड़काव किया जा सकता है। प्रदेश के निचले व मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में प्याज की पौध की रोपाई 15-20 सैं.मी. पंक्तियों में तथा 5-7  सैं.मी. पौध से पौध की दूरी रखते हुए करें। रोपाई के समय 200-250 क्विंटल गोबर की खाद के अतिरिक्त 235 कि. ग्रा. 12:32:16  मिश्रण खाद 105 किग्रा. यूरिया तथा 35 कि. ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हेक्टेयर खेतों में डालें। रोपाई के तुरन्त बाद फुहारे से हल्की सिंचाई करें। 
इसके अतिरिक्त खेतों में लगी हुई सभी प्रकार की सब्ज़ि़यों जैसे फुलगोभी, बन्दगोभी, गाँठगोभी, ब्रॉकली, चाईनीज बन्दगोभी, पालक, मेथी, मटर व लहसुन इत्यादि में निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन 40-50 कि.ग्राम यूरिया प्रति हैक्टेयर खेतों में प्रयोग करें। आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। सरसों वर्गीय तिलहनी फसलों में व गोभी वर्गीय सब्ज़ियों में तेला या एफिड का प्रकोप होने पर मैलाथियॅान 50 ई0सी0  1 मि.ली. प्रति ली. पानी की दर से छिड़काव करें। अधिक प्रकोप होने पर 15 दिन के अन्तराल पर फिर से छिड़काव करें। ध्यान रखें कि छिड़काव के बाद कम से कम एक सप्ताह तक सब्ज़ियाँ न तोड़ें। जिन क्षेत्रों में भूमि में पाये जाने वाले कीटों जैसे कि सफेद सुंडी, कटुआ कीट व लाल चींटी इत्यादि का प्रकोप होता है वहां पर आलू की बीजाई से पहले क्लोरपाइरिफॉस 20 ईसी 2 लीटर रसायन को 25 किलोग्राम रेत में मिलाकर प्रति हेक्टेयर क्षेत्र की दर से खेत में मिलाएं। जनवरी महीने में मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में कड़ाके की ठंड पड़ने लगती है। पहाड़ी इलाकों में बर्फ तथा मैदानों में कोहरे तथा धुंध के कारण पशुओं की उत्पादन और प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है, इसलिए पशुपालक इस मौसम में ठंड से बचाब से संबधित प्रबंधन कार्य सुनिश्चित करें। 
इस माह में पालतू पशुओं की देखभाल करने से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाबों में जैसे: अत्यधिक खराब मौसम में कृत्रिम रोशनी का प्रबंध, पशुओं को मोटे कपड़े या बोरों से ढंकना, गुनगुना पानी पीने के लिए देना, पशुओं के शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए उन्हें खली और गुड़ का मिश्रण खिलाना, गौशाला के फर्श पर सूखे पते या घास को विछाना और खिड़कियों और दरवाजों को रात को मोटे बोरे से ढ़कना आदि शामिल हैं। सर्दी में पशुओं के स्वास्थ्य की निगरानी रखें और किसी भी बीमारी के प्रारम्भिक लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह प्राप्त करें। सर्दी के मौसम में लगातार बर्फवारी या बारिश की स्थिति में पशुओं के लंबे समय तक गौशाला के अंदर रहने के कारण इनमें कई प्रकार की बीमारियां सामने आ सकती हैं, जिनमें से कुछ संक्रामक रोग पशुओं के लिए घातक साबित हो सकते हैं। गौशाला का ठीक से हवादार न होने की स्थिति में एकत्रित गैस जानवरों के फेफड़ों में जलन पैदा कर सकती हैं और निमोनिया जैसे श्वसन संक्रमण का कारण बन सकती हैं। भेड-बकरी में घातक संक्रामक रोग जेसे पी.पी.आर., इस समय ऊना, सोलन और शिमला जिलों में संभाबित है, जबकि भेड़ और बकरी पॉक्स, सिरमौर, शिमला, कांगड़ा और चंबा जिलों में संभाबित हो सकते हैं। 
मबेशिओं में खुरपका और मुंहपका रोग, इस समय हमीरपुर जिले में संभावित हो सकता हैं। पशुओं को संक्रामक रोगों से बचाव के लिए उनका टीकाकरण पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार अवश्य करवाऐं। इन महीनों में पशुओं को कई प्रकार के आंतरिक परजीवी जैसे: फैशिओला के संक्रमण से बचाने के लिए उन्हें पशु चिकित्सक की सलाह से परजीवी रोधी दवाई खिलाऐं। मछली पालक किसानों को सलाह दी जाती है कि तालाब में पानी की मात्रा का विशेष ध्यान रखें तथा समय-समय पर मछलियों की गतिविधियों पर भी नजर रखें। तालाबों के बांधों की मरम्मत और नर्सरी की तैयारी प्रारंभिक तौर पर शुरू कर देनी चाहिए। कॉमन कार्प बर्ड्स (नर और मादा) को चयनित करके उन्हे अलग-अलग तालाबों में एकत्रित करना प्रारंभ कर देना चाहिए। सर्दी के मौसम में मछली पालक किसान अपने तालाबों के पानी की गहराई छह फीट तक रखें, ताकि मछली को गर्म स्थान (वार्मर जोन) में शीत-निद्रा के लिए पर्याप्त जगह मिल सके। शाम के समय नलकूप से नियमित पानी डालकर सतह के पानी को गर्म जा सकता है। किसान भाईयों एवं पशु पालकों से अनुरोध है कि अपने क्षेत्रों की भौगोलिक तथा पर्यावरण परिस्थितियों के अनुसार अधिक एवं अतिविशिष्ठ जानकारी हेतु नजदीक के कृषि विज्ञान केंद्र से सम्पर्क बनाए रखें। अधिक जानकारी के लिए कृषि तकनीकी सूचना केन्द्र एटिक 01894-230395 /1800-180 -1551  से भी सम्पर्क कर सकते हैं।

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