यंगवार्ता न्यूज़ - शिमला 20-02-2026
हिमाचल प्रदेश शिक्षा बोर्ड के स्कूलों को सीबीएसई बोर्ड लागू करने को लेकर शिक्षक भड़क गए है। शिक्षकों ने सरकार को दो टूक कह दिया है कि शिक्षक की दक्षता जांचने के लिए परीक्षा आयोजित करने का कोई औचित्य नहीं बनता। वह फॉर्म नहीं भरेंगे और शिक्षक की दक्षता को जांचने के लिए यह नियम सही नहीं है। शिक्षकों की दक्षता जांचने की लिए आयोजित की जाने वाली परीक्षा का हिमाचल राजकीय अध्यापक संघ ने विरोध किया है। आज पत्रकार वार्ता के दौरान उन्होंने सरकार के इस निर्णय को गलत बताया है। साथ ही इस परीक्षा को शिक्षकों के मान सम्मान को ठेस करार दिया है। सरकार 134 स्कूलों में सीबीएसई बोर्ड शुरू करने जा रहा है।इसके लिए शिक्षकों की दक्षता जांचने के लिए परीक्षा का आयोजन भी किया जा रहा है। इस परीक्षा का विरोध करते हुए हिमाचल राजकीय शिक्षक संघ ने आह्वान किया है कि इस परीक्षा के लिए फॉर्म भरने की आवश्यकता नहीं है।
जब शिक्षक आवेदन ही नहीं करेंगे तो 5500 पद कहां से भरे जाएंगे। हिमाचल प्रदेश राजकीय अध्यापक संघ के अध्यक्ष वीरेंद्र चौहान ने कहा कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षक वर्षों से बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। जितने भी शिक्षक बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं वह परीक्षा पास कर ही यहां आए हैं। अब इतने वर्षों बाद परीक्षा के माध्यम से शिक्षकों की दक्षता जांचना उचित नहीं है। यह उनके मान सम्मान को ठेस है। उन्होंने कहा कि एक आईएएस भी इतने वर्षों बाद इस की परीक्षा नहीं दे पाएगा। जो शिक्षक 40 वर्षों से स्कूल में पढ़ा रहे हैं तो हो सकता है उन्हें भी आज इस शिक्षा देने में दिक्कतें पेश आएं। उन्होंने कहा कि अभी तक इस शिक्षा आयोजन के लिए मात्र 1500 आवेदन ही आए हैं , जबकि पूरे प्रदेश भर में 80000 शिक्षक हैं। उन्होंने प्रदेश के सभी शिक्षकों से आह्वान किया कि इस परीक्षा के लिए उन्हें आवेदन नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी शिक्षकों की राय है कि वह इस परीक्षा के लिए आवेदन नहीं देंगे।
उन्होंने कहा कि वह इस बाबत मुख्यमंत्री , मुख्य सचिव , शिक्षा मंत्री सहित अन्य अधिकारियों को ज्ञापन भी दे चुके हैं। सुरेंद्र चौहान ने कहा कि वह इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री से भी मिलेंगे। उन्होंने कहा कि इस परीक्षा का जो स्टार रखा गया है वह काफी हाई स्टैंडर्ड का है , जबकि कई शिक्षक पुराने हैं जो इस हाई स्टैंडर्ड पर खरे नहीं उत्तर पाए और साथ ही कई नेशनल आबादी भी हैं जो इस परीक्षा को उत्तीर्ण ना कर सके तो क्या जो उन्हें शिक्षा के लिए अवार्ड मिला है। वह क्या व्यर्थ है शिक्षक की दक्षता जांचने के लिए पैरामीटर उचित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सीबीएसई सिस्टम लागू करते समय शिक्षकों और स्कूलों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सीबीएसई स्कूलों में तैनाती के लिए अनुभवी शिक्षकों की दक्षता जांचने हेतु अलग से टेस्ट या परीक्षा न कराई जाए। साथ ही पहले से कार्यरत शिक्षकों को कम से कम एक वर्ष का समय दिया जाए , ताकि वे बोर्ड परीक्षा के आधार पर अपनी कार्यक्षमता साबित कर सकें। उसके बाद ही अगर वह उसपर खरा नही उतरता है तो आगे का निर्णय लिया जाए।इसके साथ ही सीबीएसई और हिमाचल स्कूल शिक्षा बोर्ड में अन्तर विद्यालय स्थानांतरण नीति हो जिससे अगर शिक्षक सीबीएसई से हिमाचल शिक्षा बोर्ड में जाना चाहे तो जा सके।
अन्यथा उसकी पदोन्नति पर इसका प्रभाव पड़ेगा। स्कूलों में शिक्षकों की रिक्तियां 100 प्रतिशत भरी जाएं और प्रिंसिपल व शिक्षकों का मूल्यांकन परीक्षा परिणाम और स्टाफ की उपलब्धता के आधार पर किया जाए। इंटर-बोर्ड ट्रांसफर शिक्षकों की इच्छा के अनुसार जारी रखने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि लड़कों और लड़कियों के स्कूलों को मर्ज करने के बजाय उन्हें मजबूत किया जाए तथा पदोन्नति व्यवस्था प्रभावित न हो। आवश्यकतानुसार वाइस-प्रिंसिपल के पद सृजित करने की मांग भी की गई। वहीं उन्होंने कहा कि सीबीएसई का फीस स्ट्रक्चर बहुत अधिक है। हो सकता है ग्रामीण क्षेत्र के लोग यह फीस वहन ना कर सके। फीस संरचना न बढ़ाने और शिक्षा विभाग में किसी भी प्रकार के निजीकरण का कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि इन सुझावों पर विचार करने से सरकार और शिक्षकों के बीच बेहतर समन्वय बनेगा।