उन्नत किस्मों और कृषि विधियों को अपनाएं किसान , हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय ने जारी की एडवायजरी 

प्रसार शिक्षा निदेशालय, चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के कृषि एवं पशुपालन वैज्ञानिकों ने नवम्बर, 2025 माह के पहले पखवाड़े में किये जाने वाले कृषि एवं पशुपालन कार्यों के बारे में निम्नलिखित सलाह दी है जिसे अपनाकर प्रदेश के किसान लाभ उठा सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में गेहूँ रबी मौसम की मुख्य फसल है

Nov 5, 2025 - 10:03
Nov 5, 2025 - 10:23
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उन्नत किस्मों और कृषि विधियों को अपनाएं किसान , हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय ने जारी की एडवायजरी 
Paras School Sadak Suraksha Doon Valley Deeserve Media
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यंगवार्ता न्यूज़ - पांवटा साहिब  05-11-2025
प्रसार शिक्षा निदेशालय, चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के कृषि एवं पशुपालन वैज्ञानिकों ने नवम्बर, 2025 माह के पहले पखवाड़े में किये जाने वाले कृषि एवं पशुपालन कार्यों के बारे में निम्नलिखित सलाह दी है जिसे अपनाकर प्रदेश के किसान लाभ उठा सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में गेहूँ रबी मौसम की मुख्य फसल है। गेहूँ को शुरू में ठण्डा वातावरण चाहिए। अगर वातावरण शुरू में गर्म हो तो जड़ कम बनता है और बिमारियां भी लगती हैं। निचले एवं मध्यवर्ती क्षेत्रों के किसान नवम्बर के प्रथम पखवाड़े में एच.पी.डब्ल्यू-155 , एच.पी.डब्ल्यू.-236 , वी.एल.-907, एच.एस.-507, एच.एस.-562, एच.पी.डब्ल्यू.-349, एचपी डब्ल्यू.- 249 व एच.पी.डब्ल्यू.-368, किस्में लगाऐं। निचले क्षेत्रों में किसान एच.डी.-3226, डी.बी.डब्ल्यू.-327,डी.बी.डब्ल्यू-371,डी.बी.डब्ल्यू-370,डी.बी.डब्ल्यू-371 व एचडी.-2687 लगाऐं। बिजाई के लिए रेक्सिल 1 ग्राम/किग्रा बीज अथवा बैविस्टिन या विटावेक्स 2.5 ग्राम/किग्रा. बीज से उपचारित बीज का प्रयोग करें। 
गेहूँ की बिजाई जहां अक्तूबर के आरम्भ में की गई हो और खरपतवारों के पौधे 2-3 पत्तों की अवस्था में हों , बिजाई के 35-40 दिनों बाद में हों तो यह समय गेहूँ में खरपतवार नाशक रसायनों के छिड़काव का है। आइसोप्रोट्यूरॉन 75 डब्ल्यू.पी. 140 ग्रा. दवाई या वेस्टा 32 ग्राम एक बीघा के लिए पर्याप्त होती है। छिड़काव के लिए 60 लीटर पानी प्रति बीघा की दर से प्रयोग करें। मसर की विपाशा (एच.पी.एल.-5) व मारकण्डे (ई.सी.-1) किस्मों की बीजाई नवम्बर के प्रथम पखवाड़े तक कर लें। यह फसल बरसात के बाद भूमि में बची नमी के द्वारा भी उगाई जा सकती है। मसूर के बड़े दाने वाली प्रजातियों के लिए बीज दर 55-60 किलोग्राम तथा छोटे दानों वाली प्रजातियों के लिए बीज दर 25 -30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उचित है। पछेती बिजाई के लिए बीज की मात्रा अधिक रखनी चाहिए। फसल को केरा विधि से 25-30 सैं.मी. की दूरी पर पंक्तियों में बीजें। प्रदेश के निचले एवं मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में प्याज की उन्नत प्रजातियों जैसे पटना रैड, नासिक रैड, पालम लोहित, पूसा रैड, एग्रीफाउंड डार्क रेड, एग्रीफाउंड लाइट रेड इत्यादि की पौध की बिजाई करें। इंडोफिल एम-45 तथा 10-15 ग्रा. उपयुक्त कीटनाशक 5 से.मी. मिट्टी की उपरी सतह में मिलाने के उपरान्त 5 सैं.मी. पंक्तियों की दूरी पर बीज की पतली बिजाई करें। 
बिजाई से पहले बीज का उपचार बैविस्टीन 2.5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज से अवश्य करें। इन्हीं क्षेत्रों में लहसुन की उन्नत प्रजातियों जी.एच.सी.-1, एग्रीफाउन्ड पार्वती की बिजाई पंक्तियों में 25 से.मी. व पौधे में 10 से.मी. की दूरी पर करें। बिजाई से पहले 200-250 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद के अतिरिक्त 235 कि.ग्रा. मिश्रण 12:32:16 खाद तथा 37 कि. ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हेक्टेयर खेतों में डालें। निचले एवं मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में मटर की उन्नत प्रजातियों जैसे हिम पालम मटर -1, पालम समूल, पी.वी.-89, जी.एस.-10, आजाद पी.-1 एवं आजाद पी.-3 की बिजाई 45 से.मी. कतारों तथा 10 सेमी. पौधा से पौधा की दूरी पर करें। बिजाई से पहले 200 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद के अतिरिक्त 187 किग्रा. मिश्रण 12:32:16 खाद, 50 कि. ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश तथा 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर खेतों में डालें। फूलगोभी, बन्दगोभी, लाल बंदगोभी, ब्रोकली,  इत्यादि की रोपाई 45-60 सेंटीमीटर पंक्ति से पंक्ति तथा 30-45 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी पर करें। पालक, मेथी, धनिया आदि को भी लगाने/बोने का उचित समय है। रोपाई से पूर्व 100 क्विंटल गोबर की गली सड़ी खाद के अतिरिक्त 185 कि.ग्रा. मिश्रण 12:32:16 उर्वरक तथा 30-40 कि. ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेतों में डालें। खेतों में पहले से लगी सभी प्रकार की सब्ज़ियों में 10 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें, फिर निराई-गुड़ाई करें तथा नत्रजन 40-50 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हेक्टेयर खेतों में डालें। 
जिन क्षेत्रों में विशेष रूप से बारानी क्षेत्रों में भूमि में पाये जाने वाले कीटों जैसे कि सफेद सुंडी , कटुआ कीट तथा दीमक आदि का अत्याधिक प्रकोप होता है, वहां गेहूं, चना, मटर आदि की बिजाई से पहले क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 2 लीटर रसायन को 25 किलोग्राम रेत में मिलाकर प्रति हेक्टेयर खेत में छिड़काव करें। गोभी वर्गीय सब्ज़ियों की पौध लगाने से पहले कटुआ कीट से प्रभावित हेतु खेतों में भी उपरोक्त कीटनाशक व विधि को अपनाएं। सरसों वर्गीय फसलों में तेले का प्रकोप हो सकता है तथा इससे बचाव हेतु मेलाथियान कीटनाशक का 1 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। गोभी व प्याज की पनीरी में कमरतोड़ रोग की रोकथाम हेतु क्यारियों को बैविस्टीन 10 ग्राम व डाईथेन एम-45 25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में घोल बनाकर ड्रेंचिंग करें। किसान भाईयों एवं पशु पालकों से अनुरोध है कि अपने क्षेत्रों की भौगोलिक तथा पर्यावरण परिस्थितियों के अनुसार अधिक एवं अति विशिष्ट जानकारी हेतु नजदीक के कृषि विज्ञान केंद्र से सम्पर्क बनाए रखें । अधिक जानकारी के लिए कृषि तकनीकी सूचना केन्द्र एटिक 01894-230395/1800-180-1551 से भी सम्पर्क कर सकते हैं ।

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