प्रदेश के बागवानों के लिए टूटी सड़कों से मंडियों तक सेब पहुंचाना बना बड़ी चुनौती

हिमाचल प्रदेश में इस बार की बरसात सेब बागवानों पर भारी पड़ी है। बागवानों के लिए टूटी सड़कों से मंडियों तक सेब पहुंचाना चुनौती बन गया है। जहां बादल फटे हैं, वहां बड़ा नुकसान हो रहा है तो अन्य क्षेत्रों पर भी बारिश ने कहर बरपाया

Jul 17, 2025 - 11:36
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प्रदेश के बागवानों के लिए टूटी सड़कों से मंडियों तक सेब पहुंचाना बना बड़ी चुनौती
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यंगवार्ता न्यूज़ - शिमला     17-07-2025

हिमाचल प्रदेश में इस बार की बरसात सेब बागवानों पर भारी पड़ी है। बागवानों के लिए टूटी सड़कों से मंडियों तक सेब पहुंचाना चुनौती बन गया है। जहां बादल फटे हैं, वहां बड़ा नुकसान हो रहा है तो अन्य क्षेत्रों पर भी बारिश ने कहर बरपाया है। संपर्क सड़कों को ठीक करने के लिए जिला प्रशासन की ओर से जारी बजट कम पड़ रहा है। 

सैकड़ों सड़कें पंचायतों और विकास खंडों ने बनाई हैं। इन्हें दुरुस्त करना भी आसान काम नहीं है। जिला मंडी में सेब उत्पादन के लिए मशहूर थुनाग उपमंडल में प्राकृतिक आपदा ने बगस्याड़ से लेकर थुनाग, जंजैहली से संगलवाड़ा और इसके आसपास के क्षेत्रों में संपर्क सड़कों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है। 

कई जगह सड़कों का नामोनिशान मिट गया है। सेब को मुख्य सड़क तक पहुंचाना मुश्किल कार्य हो गया है। अभी भी उपमंडल की 35 सड़कें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हैं। बगस्याड़ शिकारी और तांदी-द्रौण सड़कों को भारी नुकसान पहुंचा है। 

मंडी जिला के ही करसोग, पांगणा, चुराग, चरखड़ी, कमांद, रोहांडा, चौकी, शकोहर, थमाड़ी, घीड़ी बाडु, कुटाहची, सरोआ, फंग्यार, जबाल, जहल, सलाहर, बगस्याड़, थुनाग, जंजैहली, थाची, पंजाई, छतरी आदि क्षेत्रों में सेब का उत्पादन होता है। 

इस बार सड़कें बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने से बागवानों की चिंता बढ़ गई है। नाचन फल सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष बिंदर ठाकुर ने कहा कि आपदा से जिला कुल्लू की सैंज घाटी में 21 दिनों से 6 सड़कें बंद हैं, जबकि बंजार में दो व कुल्लू में छह सड़कें अवरुद्ध हो गई है।

इन सड़कों में न तो बसें जा रही हैं और न ही छोटे वाहन। मंडी और कुल्लू के इन क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि शिमला जिला के कई क्षेत्रों में भी सड़कों की हालत खराब होने से सेब को बाजार तक पहुंचाना मुश्किल काम हो गया है। जिला शिमला की तहसील ठियोग की ग्राम पंचायत क्यार के जई वार्ड के सदस्य रामनाथ शर्मा का कहना है कि सड़कों को सुधारा जाना जरूरी है। 

उनके वार्ड के तहत आने वाले कई गांवों के लोगों को सेब निकालना इसलिए मुश्किल हो जाता है कि क्यार खड्ड उफान पर पहुंच जाती है। यहां के कई गांवों से पराला मंडी महज 8 से 15 किलोमीटर दूरी पर है, मगर सड़क पर कोई पुल नहीं होने से सेब को खड्ड के थोड़ा बैठ जाने के बाद पीठ से ढोना होता है। 

नेपाली बगीचों से सड़क तक सेब की एक पेटी पहुंचाने के लिए 80 से 100 रुपये लेते हैं। ऐसे में एक पेटी का मार्केट तक कैरिज ही 150 रुपये तक पड़ता है। संपर्क मार्गों को दुरुस्त करना बड़ा जरूरी है।

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