नए वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही आम लोगों पर पडऩे जा रहा दवाओं की कीमतों का अतिरिक्त बोझ  

नए वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही आम लोगों पर दवाओं की कीमतों का अतिरिक्त बोझ पडऩे जा रहा है। पहली अप्रैल से राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के आदेश के तहत आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) में शामिल 900 से अधिक दवाओं के दाम बढ़ जाएंगे

Mar 30, 2026 - 11:58
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यंगवार्ता न्यूज़ - सोलन   30-03-2026

नए वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही आम लोगों पर दवाओं की कीमतों का अतिरिक्त बोझ पडऩे जा रहा है। पहली अप्रैल से राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के आदेश के तहत आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) में शामिल 900 से अधिक दवाओं के दाम बढ़ जाएंगे। इस फैसले के बाद बुखार, दर्द, संक्रमण, एनीमिया और पोषण संबंधी जरूरतों में इस्तेमाल होने वाली कई सामान्य दवाएं महंगी हो जाएंगी। 

एनपीपीए द्वारा जारी आदेश के अनुसार थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के आधार पर अनुसूचित दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) में 0.64956 प्रतिशत तक वृद्धि की अनुमति दी गई है। यह बढ़ोतरी उन दवाओं पर लागू होगी, जो राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची में शामिल हैं। इनमें पैरासिटामोल, विभिन्न एंटीबायोटिक्स, एनीमिया की दवाएं, विटामिन और मिनरल सप्लीमेंट्स सहित कई जरूरी और जीवन रक्षक दवाएं शामिल हैं। 

हालांकि यह वृद्धि प्रतिशत के लिहाज से बहुत अधिक नहीं है, लेकिन रोजमर्रा की स्वास्थ्य जरूरतों से जुड़ी दवाओं के दाम बढऩे का असर सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। खासकर ऐसे परिवारों पर इसका असर अधिक महसूस होगा, जहां नियमित दवाओं का इस्तेमाल होता है।

ड्रग्स (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के प्रावधानों के तहत दवा निर्माता इस अनुमत वृद्धि के आधार पर अनुसूचित दवाओं की कीमतों में संशोधन कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें सरकार से अलग से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। फार्मा उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 

वैश्विक परिस्थितियों और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण एपीआई (एक्टिव फार्मास्युटिकल इन्ग्रेडिएंट्स) और सॉल्वेंट्स महंगे हुए हैं। उद्योग सूत्रों के मुताबिक हाल के समय में एपीआई की कीमतों में 30 से 35 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ग्लिसरीन के दाम 64 प्रतिशत, पैरासिटामोल 25 प्रतिशत और सिप्रोफ्लोक्सासिन 30 प्रतिशत तक महंगे हुए हैं। 

इसके अलावा एल्युमीनियम फॉयल, प्लास्टिक और अन्य पैकेजिंग सामग्री की लागत में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। बताया जा रहा है कि पैकेजिंग से जुड़े कुछ प्रमुख इनपुट्स में करीब 40 प्रतिशत तक महंगाई दर्ज की गई है, जिससे दवा कंपनियों की उत्पादन लागत और बढ़ी है। फार्मा उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है कि इनपुट लागत में भारी बढ़ोतरी की तुलना में 0.64 प्रतिशत की मूल्य वृद्धि काफी सीमित है। 

उनका मानना है कि कच्चे माल, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स पर बढ़ते खर्च को देखते हुए यह राहत पर्याप्त नहीं है। उद्योग संगठनों ने संकेत दिए हैं कि वे आने वाले समय में सरकार के समक्ष इस मुद्दे को और मजबूती से उठा सकते हैं।

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