शोभा यात्रा के साथ संपन्न हुआ ग्यास देव उत्सव , एक कोस की चढ़ाई चढ़ते हुए 7  स्थानों पर दूध की चढ़ती है धार 

जिला सिरमौर के पच्छाद उपमंडल के आराध्य देव भूर्शिंग देवता देव ग्यास को होने वाला देव उत्सव अपने आप में गहरा इतिहास समेटे हुए है। शनिवार को भूर्शिंग महादेव देवस्थली पजेली से कथाड़ कवागधार मंदिर तक शोभा यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। बता दें यहां होने वाली देव परंपराएं अलग तो हैं ही, साथ ही वे किसी चमत्कार से कम भी नहीं हैं

Nov 2, 2025 - 13:58
Nov 2, 2025 - 14:13
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शोभा यात्रा के साथ संपन्न हुआ ग्यास देव उत्सव , एक कोस की चढ़ाई चढ़ते हुए 7  स्थानों पर दूध की चढ़ती है धार 
Paras School Sadak Suraksha Doon Valley Deeserve Media
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यंगवार्ता न्यूज़ - नाहन  02-11-2025

जिला सिरमौर के पच्छाद उपमंडल के आराध्य देव भूर्शिंग देवता देव ग्यास को होने वाला देव उत्सव अपने आप में गहरा इतिहास समेटे हुए है। शनिवार को भूर्शिंग महादेव देवस्थली पजेली से कथाड़ कवागधार मंदिर तक शोभा यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। बता दें यहां होने वाली देव परंपराएं अलग तो हैं ही, साथ ही वे किसी चमत्कार से कम भी नहीं हैं। यहां की विशेषता यह है कि देवता पालकी में नहीं चलते, बल्कि सीधे देव शक्ति पुजारी में प्रवेश करती है और वह अपने पारंपरिक श्रृंगार से सुसज्जित होकर साक्षात देवता रूप में पैदल मंदिर पहुंचते हैं। 
यह देव यात्रा अढ़ाई किलोमीटर यानी एक कोस चढ़ाई का सफर कर मंदिर (मोड़) में पूरी होती है। स्वयंभू शिवलिंग से सुसज्जित इस मंदिर के इतिहास को लेकर 16 वीं व 17वीं शताब्दी से इसका उल्लेख भी है। इसकी अपनी देव परंपराएं हैं , जो ग्यास पर्व पर देखने को मिलती हैं। देवता के श्रृंगार व साज सज्जा का भी अपना अलग ही महत्व है। देव स्थली पूजारली ( पजेली ) में देवता का श्रृंगार कर अपना विशेष बाणा ( पारंपरिक पोशाक ) धारण करते हैं। इस दौरान उन्हें वह पगड़ी पहनाई जाती है, जिसमें देवता का छत्र जड़ा होता है। इस छत्र को मंदिर या मोड़ पर पहुंचकर पगड़ी से उतारने के साथ ही स्वयंभू शिवलिंग-पिंडी पर सजा दिया जाता है। 
ग्यास पर्व पर होने वाले इस विशेष देव उत्सव में शामिल होने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। देवता वाद्य यंत्रों की धुनों के बीच एक कोस की चढ़ाई चढ़ते हुए 7 चिन्हित स्थानों पर दूध की धार चढ़ाते हैं और मोड़ में पहुंचते ही 8वीं धार शिला पर चढ़ाते हैं। इसके बाद ही देवता मंदिर में प्रवेश करते है। भूर्शिंग महादेव की देव परंपरा भी एकदम निराली है। यहां गोपनीय शाबरी मंत्र व पारंपरिक धूप दीप से पूजा के चलते देवता रात्रि के घुप अंधेरे व कंपकपाती ठंड के बीच एक विचित्र चमत्कार करते हैं। 
देवता एक ऐसी शिला पर न केवल छलांग लगाते हैं , बल्कि करवटें भी बदलते हैं। जो पहाड़ में तिरछी लटकी है। हर वर्ष दीपावली के बाद ग्यास को यहां देव उत्सव मनाया जाता है। हजारों श्रद्धालु अपने आराध्य देव के दर्शनार्थ मंदिर में पहुंचते हैं, जो कच्चा दूध चढ़ाकर उन्हें प्रसन्न करते हैं। भूर्शिंग महादेव का देव उत्सव दीपावली के साथ ही शुरू हो जाता है। मान्यता के मुताबिक कथाड़ (क्वागधार) पर्वत शिखर पर बैठकर भगवान शिव व मां पार्वती ने महाभारत का युद्ध देखा था।

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